देश के वरिष्ठ नेता और चार राज्यों के राज्यपाल रह चुके सत्यपाल मलिक का हाल ही में दिल्ली के राम मनोहर लोहिया (RML) अस्पताल में निधन हो गया। वे लंबे समय से बीमार चल रहे थे और 78 वर्ष की आयु में उन्होंने अंतिम सांस ली।
सत्यपाल मलिक का कार्यकाल भारतीय राजनीति में कई ऐतिहासिक और संवेदनशील घटनाओं का साक्षी रहा। उन्होंने बिहार, जम्मू-कश्मीर, गोवा और मेघालय जैसे राज्यों में राज्यपाल के रूप में कार्य किया। उनके कार्यकाल को उनकी स्पष्टवादी छवि और साहसिक बयानों के लिए याद किया जाता है।
बिहार के राज्यपाल (30 सितंबर 2017 – 21 अगस्त 2018)
राज्यपाल के रूप में उनका पहला कार्यकाल बिहार में रहा। यहां उन्होंने राज्य विश्वविद्यालयों की व्यवस्था और शिक्षा प्रणाली में सुधार की आवश्यकता पर कई बार चिंता जताई।
जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल (23 अगस्त 2018 – 30 अक्टूबर 2019)
यह कार्यकाल सबसे ऐतिहासिक रहा, क्योंकि 5 अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 हटाने और राज्य पुनर्गठन के केंद्र सरकार के निर्णय के समय वही जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल थे। इस बड़े संवैधानिक बदलाव के दौरान उन्होंने घाटी में शांति बनाए रखने की प्रशासनिक जिम्मेदारी निभाई।
उनका यह कार्यकाल लंबे समय तक सार्वजनिक और राजनीतिक बहस का केंद्र बना रहा।
गोवा के राज्यपाल (3 नवंबर 2019 – 18 अगस्त 2020)
गोवा में रहते हुए उन्होंने खनन, पर्यावरण और सरकारी पारदर्शिता जैसे विषयों पर केंद्र और राज्य सरकार को आड़े हाथों लिया। उनका यह रुख उन्हें अन्य राज्यपालों से अलग करता है।
मेघालय के राज्यपाल (18 अगस्त 2020 – अक्टूबर 2022)
यह उनका अंतिम कार्यकाल था। इस दौरान भी उन्होंने किसानों के आंदोलन और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर खुलकर अपनी राय दी। मेघालय में रहते हुए उन्होंने कई बार यह कहा कि वे “संवैधानिक पद पर हैं, लेकिन जनहित से मुंह नहीं मोड़ सकते।”
सत्यपाल मलिक को भारतीय राजनीति में उन दुर्लभ नेताओं में गिना जाता है जिन्होंने राज्यपाल जैसे संवैधानिक पद पर रहते हुए भी जनहित और लोकतंत्र की आवाज़ बुलंद की। वे अपने बेधड़क बयानों और सटीक राजनीतिक विश्लेषण के लिए हमेशा चर्चा में रहे।
