रमज़ान के पवित्र महीने के तीसरे जुमे के दिन भी अल-अक़्सा मस्जिद के आंगन नमाज़ियों से खाली रहे। फ़लस्तीनी सूत्रों के अनुसार लगातार सातवें दिन इज़राइली अधिकारियों ने मस्जिद में नमाज़ियों के प्रवेश पर रोक लगा रखी है, जिसके कारण जुमे की नमाज़ अदा नहीं हो सकी।
सुबह फ़ज्र की अज़ान और तकबीर की आवाज़ें पूरे कब्ज़ा किए गए यरुशलम में गूंजती रहीं, लेकिन मस्जिद के आंगनों में गहरा सन्नाटा पसरा रहा। इज़राइली सुरक्षा बलों ने ओल्ड सिटी के प्रवेश द्वारों और अल-अक़्सा मस्जिद के गेट्स पर कड़ी सैन्य निगरानी तैनात कर दी है, जिसके चलते हज़ारों फ़लस्तीनियों को जुमे की फ़ज्र की नमाज़ में शामिल होने से रोका गया।
इज़राइल का कहना है कि यह कदम सुरक्षा कारणों से उठाया गया है, लेकिन कब्ज़ा किए गए यरुशलम के फ़लस्तीनी इसे मस्जिद की धार्मिक पहचान और पवित्रता को निशाना बनाने वाली एक व्यवस्थित नीति का हिस्सा मानते हैं।
मैदानी रिपोर्टों के मुताबिक़ मस्जिद की लगातार बंदी के कारण न सिर्फ़ जुमे की नमाज़ बल्कि इशा और तरावीह की नमाज़ें भी अदा नहीं हो पा रही हैं। इसी दौरान इज़राइली अधिकारियों की ओर से यह भी कहा जा रहा है कि यह कदम मस्जिद की सुरक्षा के लिए उठाया गया है।
हालांकि फ़लस्तीनी इस दावे को खारिज करते हुए कहते हैं कि यह बस एक बहाना है, ताकि यहूदी बसने वालों की घुसपैठ को आसान बनाया जा सके और मस्जिद को उन लोगों से खाली कराया जा सके जो वहां लगातार मौजूद रहते हैं। कई फ़लस्तीनियों को आशंका है कि मौजूदा क्षेत्रीय परिस्थितियों का फायदा उठाकर इज़राइल लंबे समय से चल रही “जुडाइजेशन” योजनाओं को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।
यरुशलम गवर्नरेट ने भी पुष्टि की है कि इज़राइली पुलिस ने उन्हें सूचित किया है कि अल-अक़्सा मस्जिद को नमाज़ियों के लिए बंद रखा जाएगा और जुमे की नमाज़ वहां आयोजित नहीं होगी।
गुरुवार को जारी एक आधिकारिक बयान में इज़राइली पुलिस ने कहा कि होम फ्रंट कमांड के निर्देशों के कारण मस्जिद में जुमे की नमाज़ आयोजित नहीं की जाएगी।
यह बंदी उस समय लागू की गई है जब इज़राइल ने वेस्ट बैंक में व्यापक लॉकडाउन की घोषणा की है। यह घोषणा उस बड़े सैन्य हमले के कुछ घंटों बाद की गई, जिसमें अमेरिका और इज़राइल की सेनाओं ने ईरान पर बड़े पैमाने पर हमला शुरू किया।
इन घटनाओं के बाद फ़लस्तीनी संगठनों ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। हमास आंदोलन ने इन प्रतिबंधों को खुली आक्रामकता और सभी लाल रेखाओं को पार करने वाला कदम बताया है। संगठन का कहना है कि बलपूर्वक नई स्थिति थोपने की कोशिशें अल-अक़्सा से जुड़े लोगों के हौसले को कम नहीं करेंगी बल्कि उनके संकल्प को और मज़बूत करेंगी।
हमास के अधिकारी माजिद अबू क़तेश ने कहा कि ये पाबंदियां वेस्ट बैंक में नियंत्रण सख़्त करने की व्यापक नीति का हिस्सा हैं। उनका आरोप है कि इसके जरिए कब्ज़ा किए गए यरुशलम को उसके आसपास के इलाकों से अलग करने की कोशिश की जा रही है, ताकि अल-अक़्सा के समर्थन में सार्वजनिक एकजुटता को रोका जा सके। उन्होंने इज़राइली अधिकारियों पर यह भी आरोप लगाया कि वे धार्मिक स्वतंत्रता और बुनियादी मानवाधिकारों के उल्लंघन को छिपाने के लिए व्यवस्थित रूप से ग़लत जानकारी फैला रहे हैं।
मौजूदा हालात के बीच फ़लस्तीनी राष्ट्रीय समूहों और यरुशलम की संस्थाओं ने लोगों से बड़े पैमाने पर लामबंद होने की अपील की है। उन्होंने फ़लस्तीनियों से कब्ज़ा किए गए यरुशलम की ओर कूच करने का आह्वान किया है ताकि मस्जिद पर लगाए गए घेरे को तोड़ा जा सके और उसे अकेला न छोड़ा जाए।
साथ ही अरब और मुस्लिम देशों से तत्काल और ठोस कदम उठाने की अपील की गई है, ताकि इस्लाम के तीसरे सबसे पवित्र स्थल की पवित्रता को ख़तरे में डालने वाली कार्रवाइयों को रोका जा सके। फ़लस्तीनी संगठनों ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से भी अल-अक़्सा मस्जिद के खिलाफ हो रहे उल्लंघनों पर अपनी चुप्पी तोड़ने की मांग की है।
