मध्य पूर्व में तेज़ होते युद्ध ने, पूरे क्षेत्र में आम नागरिकों की पीड़ा और विस्थापन के प्रति चिन्ताएँ बढ़ा दी हैं. यूएन एजेंसियों ने शुक्रवार को आगाह किया कि टकराव का दायरा बढ़ने से मानवीय स्थिति तेज़ी से बिगड़ती जा रही है. लेबनान में बड़े पैमाने पर उथल-पुथल की स्थिति है, जहाँ सैकड़ों शरणस्थल अब पूरी तरह भर चुके हैं, और बेरूत के अनेक उपनगर लगभग खाली हो गए हैं.
ईरान में इसराइल और अमेरिका की बमबारी और फिर ईरान की जवाबी कार्रवाई शुरू हुए अब सात दिन हो चुके हैं, दोनों ओर से हमले अब भी जारी हैं, और मध्य पूर्व क्षेत्र में तनाव चरम पर है.
यूएन मानवाधिकार कार्यालय (OHCHR) की प्रवक्ता रवीना शमदासानी ने बताया कि दक्षिणी लेबनान में, इसराइली बलों ने व्यापक स्तर पर स्थानीय लोगों को अपने घर छोड़कर चले जाने के आदेश दिए हैं.
इनमें बेरूत के दक्षिणी उपनगर, बेक़ा घाटी और लितानी नदी के दक्षिण के पूरे इलाके़ शामिल हैं. देश के विभिन्न हिस्सों में लगातार हो रहे हवाई हमले, पहले से ही थकी हुई, हताश नागरिक आबादी की पीड़ा को और बढ़ा रहे हैं.
प्रवक्ता रवीना शमदासानी ने कहा कि इन सैन्य कार्रवाइयों के कारण, बड़ी संख्या में लोग अपने घरों से विस्थापित हो रहे हैं, जिससे मानवीय संकट और गहराता जा रहा है.

यूएन की अन्तरराष्ट्रीय प्रवासन एजेंसी (IOM) के लेबनान मिशन प्रमुख मैथ्यू लुसियानो ने गुरुवार को बताया कि देश में स्थिति “तेज़ी से बिगड़” रही है. इसराइली बलों द्वारा बीती रात बेरूत के दक्षिणी उपनगरों पर कई हवाई हमले किए जाने की ख़बर है.
अनेक सामूहिक शरणस्थल पूरी तरह भर चुके हैं, विशेषकर बेरूत और माउंट लेबनान में. ऐसे में, लोगों को अन्य शरण स्थलों की ओर भेजा जा रहा है.
उधर, यूएन शरणार्थी एजेंसी (UNHCR) ने बढ़ते संकट को एक विशाल मानवीय आपात स्थिति के रूप में घोषित किया है, जिसके लिए तत्काल क्षेत्रीय प्रतिक्रिया की ज़रूरत पर बल दिया है.
UNHCR के आपात निदेशक आयाकी इतो ने जिनीवा में पत्रकारों से बातचीत में कहा कि यह युद्ध पूरे क्षेत्र और दक्षिण-पश्चिम एशिया की ओर बड़े पैमाने पर आबादी के पलायन को जन्म दे रहा है.
उन्होंने बताया कि प्रभावित क्षेत्रों में, पहले से ही लगभग 2.5 करोड़ शरणार्थी, आन्तरिक रूप से विस्थापित या हाल ही में अपने घर लौटे हुए लोग हैं, जिससे मेज़बान देशों पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है.
तेज़ी से भरते आश्रय स्थल
लेबनान में, यूएन के उप विशेष समन्वयक, आवासीय और मानवीय समन्वयक इमरान रिज़ा ने बताया कि “आज मैंने UNHCR के साथ बेरूत स्थित लेबनानी विश्वविद्यालय में बने एक सामूहिक आश्रय स्थल का दौरा किया, जहाँ लगभग 140 परिवार शरण लिए हुए हैं. इनमें से अनेक लोग दक्षिणी लेबनान और बेरूत के दक्षिणी उपनगरों से विस्थापित होकर आए हैं.”
“अनेक लोग ऐसे हैं, जिन्होंने जो कुछ पहना हुआ था, उन्हीं कपड़ों में अपने घरों से भागकर वहाँ पहुँचे, कुछ अभी भी पजामे में थे. उनकी ज़रूरतेंव्यापक और तात्कालिक हैं.”
इमरान रिज़ा के अनुसार, लेबनान की सरकार अधिक से अधिक सामूहिक आश्रय स्थल खोलने की कोशिश कर रही है, लेकिन वे तेज़ी से भरते जा रहे हैं. विस्थापित परिवारों का पंजीकरण किया जा रहा है ताकि सभी को सुरक्षित आश्रय और जीवनरक्षक सहायता उपलब्ध कराई जा सके.
उन्होंने चेतावनी दी कि राहत सामग्री और संसाधनों की तत्काल आवश्यकता है.

UNIFIL कर रहा है सहायता
लेबनान के लिए यूएन मिशन (UNIFIL) के अनुसार, लगातार हो रहे हवाई हमलों और दोनों पक्षों के बीच गोलीबारी के कारण, युद्ध प्रभावित इलाक़ों से बड़ी संख्या में बच्चों और महिलाओं समेत अनेक परिवार अपने घर छोड़ने को मजबूर हो रहे हैं.
UNIFIL के अधिकारी तिलक पोखरेल ने बताया कि शान्तिरक्षक, उन आम लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुँचाने में मदद कर रहे हैं जो स्वयं क्षेत्र से निकल पाने में असमर्थ हैं.
इसके साथ ही, वे मानवीय सहायता पहुँचाने के प्रयासों का भी समर्थन कर रहे हैं, जिसमें लेबनानी रैड क्रॉस की टीमों को, घायलों और विस्थापित लोगों तक पहुँचने में सहायता देना शामिल है.
उन्होंने चेतावनी दी कि स्थिति अब भी “बहुत नाज़ुक” बनी हुई है और यदि हिंसा नहीं रुकी तो हालात “नियंत्रण से बाहर” हो सकते हैं.

धन की कमी, एक बड़ी चुनौती
इस बीच, अनेक यूएन मानवीय एजेंसियों ने राहत कार्यों के लिए धन की भारी कमी को लेकर गम्भीर चिन्ता व्यक्त की है.
जिनीवा स्थित एजेंसियों का कहना है कि ज़मीनी स्तर पर ज़रूरतें लगातार बढ़ रही हैं, लेकिन उसके मुक़ाबले वित्तीय सहायता बेहद कम मिल रही है.
IOM प्रवक्ता मैथ्यू लुसियानो ने चेतावनी दी कि पर्याप्त संसाधनों के बिना प्रभावित आबादी तक जीवनरक्षक सहायता पहुँचाना और अधिक कठिन होता जा रहा है.
ग़ाज़ा, सूडान तक पहुँच प्रभावित
IOM की मानवीय प्रतिक्रिया और पुनर्वास मामलों की उपनिदेशक ऐन शेफ़र ने बताया कि समुद्री मार्गों से होने वाली आवाजाही पर भी संकट का गहरा असर पड़ा है.
उनके अनुसार, ग़ाज़ा के लिए भेजे जाने वाली अस्थाई आश्रय सामग्री, तिरपाल, तम्बू और लैम्प जैसी राहत सामग्रियाँ अलग-अलग चरणों में अटकी हुई हैं, और फ़िलहाल ज़रूरतमन्दों तक नहीं पहुँच पा रहे हैं.
उन्होंने चेतावनी दी कि इससे सप्लाई चेन में तेज़ी से “गम्भीर गिरावट” आ सकती है. उधर, सूडान में भी बिगड़ती मानवीय स्थिति में राहत अभियानों पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है.
उपनिदेशक ऐन शेफ़र के अनुसार, सूडान में जल्द ही बारिश का मौसम शुरू होने वाला है, इसलिए यदि अगले 6 से 8 सप्ताह के भीतर आवश्यक राहत सामग्री नहीं पहुँची, तो विशेषकर दारफ़ूर जैसे क्षेत्रों में प्रभावित आबादी तक सहायता पहुँचाना बेहद कठिन हो जाएगा.
Source : UN News Hindi
