सऊदी अरब में, अन्य देशों से कामकाज व रोज़गार पाने के लिए आने वाले लोगों को प्रायोजित करने (Sponsorship) की प्रक्रिया को समाप्त करने की अपील की गई है जिसे ‘कफ़ाला’ व्यवस्था कहा जाता है. संयुक्त राष्ट्र के स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञों ने सऊदी अरब से यह अपील, वर्ष 2034 में देश में आयोजित होने वाले फ़ीफ़ा फ़ुटबॉल विश्व कप की तैयारियों के सम्बन्ध में की है.
यूएन मानवाधिकार विशेषज्ञों ने बुधवार को कहा है कि प्रवासी श्रमिकों की सुरक्षा, गरिमा और अधिकार सुनिश्चित करना, न केवल फ़ुटबॉल विश्व कप की सफलता के लिए ज़रूरी है, बल्कि सऊदी अरब की व्यापक विकास दृष्टि की विश्वसनीयता के लिए भी अहम है.
इन तीन मानवाधिकार विशेषज्ञों के नाम हैं: तोमोया ओबोकाता, गेहाद मादी और सियोभान म्यूलली.
संयुक्त राष्ट्र के इन तीन मानवाधिकार विशेषज्ञों ने कहा है कि सऊदी अरब में “सुधारों की घोषणा के 5 वर्ष बीतने के बावजूद, हमें अब भी देश में अनुमानित 1 करोड़ 60 लाख आप्रवासी (अन्य देशों से आए) श्रमिकों के साथ दुर्व्यवहार और श्रम शोषण की ख़बरें मिल रही हैं.”
उन्होंने कहा “आप्रवासी श्रमिकों की मौतें अस्पष्ट परिस्थितियों में हुई हैं और इन मामलों में जवाबदेही नहीं तय की गई है. वेतन की चोरी, कार्यस्थल पर हिंसा, पहचान दस्तावेज़ों को ज़ब्त रखना और कामकाज व रोज़गार दिलाने के बदले, अत्यधिक रक़म वसूलना जैसी प्रथाएँ अब भी जारी हैं. इन पर तत्काल रोक लगाई जानी होगी.”
क्या है कफ़ाला व्यवस्था?
कफ़ाला एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें नियोक्ताओं को, अन्य देशों से रोज़गार व कामकाज के लिए आने वाले आप्रवासी श्रमिकों की क़ानूनी स्थिति, निवास, रोज़गार बदलने और यात्रा की पूरी नियंत्रण शक्ति मिल जाती है.
ये रोज़गार या कामकाज, सऊदी अरब के किसी नागरिक की सिफ़ारिश पर दिए जाने की व्यवस्था रही है जिसे कामगारों को प्रायोजित यानि Sponsorship करना भी कहा जाता है.
कफ़ाला व्यवस्था के तहत, आप्रवासी श्रमिकों को देश छोड़ने, रोज़गार बदलने या क़ानूनी सहायता लेने के लिए अपने प्रायोजक यानि नियुक्ता या फिर सिफ़ारिश करने वाले व्यक्ति की अनुमति की ज़रूरत होती है.
2021 में शुरू की गई श्रम सुधार पहल के कफ़ाला व्यवस्था में व्यापक सुधार करने या इसे ख़त्म की शुरुआत के बावजूद, इस व्यवस्था के कई पहलू अब भी लागू हैं.
साथ ही, मौजूदा ख़ामियों के कारण नियोक्ताओं का श्रमिकों पर अत्यधिक नियंत्रण बना हुआ है.
मानवाधिकार रिपोर्ट के अनुसार, शोषण करने वाले रोज़गार से निकलने की कोशिश करने वाले आप्रवासी श्रमिकों को रोके रखने के लिए, देश से बाहर जाने पर प्रतिबन्ध और झूठे आपराधिक आरोप लगाने जैसे तरीक़े भी अपनाए जाते हैं.
ये परिस्थितियाँ श्रमिकों की आवाजाही और स्वतंत्रता को लेकर गम्भीर चिन्ताएँ उत्पन्न करती हैं.

न्याय तक सीमित पहुँच
रिपोर्ट के मुताबिक़, न्याय तक पहुँच अब भी सीमित बनी हुई है, क्योंकि अनेक श्रमिकों को शोषण की शिकायत दर्ज कराने में बाधाओं का सामना करना पड़ता है.
इनमें प्रतिशोध का डर, क़ानूनी सहायता की कमी और जटिल प्रशासनिक प्रक्रियाएँ शामिल हैं.
साथ ही, सऊदी अरब में इस रोज़गार या कामकाज के दौरान जिन श्रमिकों की मृत्यु हो जाती है, उनके बारे में, अन्य देशों में रहने वाले परिवारों को जानकारी प्राप्त करने, जवाबदेही तय कराने और मुआवज़ा पाने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है.
प्रस्तावित सुधारों के बावजूद, घरेलू कामकाज करने वाले आप्रवासी श्रमिक, विशेष रूप से जबरन श्रम के लिए मानव तस्करी, अमानवीय कार्य परिस्थितियों और शारीरिक या यौन हिंसा के जोखिम में बने हुए हैं.
साथ ही, उन्हें अब भी बुनियादी श्रम सुरक्षा क़ानूनों के दायरे से बाहर रखा जाता है.
मध्य पूर्व युद्ध से और ख़राब हुए हालात
मध्य पूर्व में युद्ध भड़कने से, आप्रवासी श्रमिकों के लिए जोखिम और अधिक बढ़ गए हैं, जिन्हें ऐसे अस्थिर हालात में अचानक रोज़गार खोने, घायल होने या मृत्यु तक का सामना करना पड़ सकता है.
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि ये कमजोरियाँ पहले से मौजूद असमानताओं को और गहरा करती हैं, जिससे सुधार, तुरन्त किए जाने की आवश्यकता बलवती होती है.
उन्होंने कहा, “वैसे तो अनेक आप्रवासी श्रमिक सऊदी अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, लेकिन उनमें से अनेक की आवाज़ या राय को कोई अहमियत नहीं दी जाती है और वे अक्सर शोषण के चक्र में फँसे रहते हैं.”
मानवाधिकार विशेषज्ञों ने सऊदी अरब से तत्काल और ठोस कार्रवाई करने की अपनी मांग दोहराई है.

कुछ सुझाव…
विशेषज्ञों ने ज़ोर दिया है कि प्रवासी श्रमिकों को राष्ट्रीय श्रम सुरक्षा के दायरे में पूरी तरह शामिल किया जाना चाहिए, निगरानी और प्रवर्तन तंत्र को मज़बूत किया जाना चाहिए तथा शिकायत दर्ज कराने के लिए सुरक्षित और सुलभ व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए.
उन्होंने कफ़ाला प्रणाली को क़ानून और व्यवहार के स्तरों पर प्रभावी रूप से समाप्त करने की अपील की, ताकि आप्रवासी श्रमिक, किसी अनुचित प्रतिबन्ध के बिना, रोज़गार बदल सकें और देश छोड़ सकें.
साथ ही, उन्होंने सऊदी अरब से आप्रवासी श्रमिकों और उनके परिवारों के अधिकारों की सुरक्षा से जुड़े अन्तरराष्ट्रीय समझौते की पुष्टि (ratification) करने का भी आग्रह किया.
विशेषज्ञों ने कहा, “वास्तविक परिवर्तन के लिए लगातार कार्यान्वयन, स्वतंत्र निगरानी और जवाबदेही आवश्यक है.”
स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञ
मानवाधिकारों की स्थिति पर नियुक्त विशेषज्ञों को, जिनीवा स्थित यूएन मानवाधिकार परिषद से शासनादेश प्राप्त होता है. उनका दायित्व किसी देश में विशेष मानव अधिकार स्थिति या वैश्विक स्तर पर विशेष मानवाधिकार स्थिति से सम्बन्धित मामलों की जाँच-पड़ताल करके रिपोर्ट सौंपना होता है.
विशेष रैपोर्टेयर संयुक्त राष्ट्र के कर्मचारी नहीं होते हैं, उन्हें अपने काम के लिए, संयुक्त राष्ट्र से वेतन नहीं मिलता है और वे किसी सरकार या संगठन से स्वतंत्र होकर काम करते हैं.
Source : UN News
