टीवी स्टूडियो से गली-मोहल्लों तक: नफ़रत की राजनीति में मीडिया की भूमिका

Author : Prashant Tandon

2014 में एक खून का प्यासा मीडिया बनाया गया, रेडियो रवांडा की तर्ज पर.
2014 में गुजरात 2002 का मॉडल को लेकर नरेंद्र मोदी गांधीनगर से दिल्ली आये थे – इस मीडिया ने टीवी स्टूडियो को ही 2002 बना दिया. पत्रकारिता के एथिक्स, शर्म, मर्यादा, जवाबदेही, समाज का डर सब कुछ एक साथ जमा करके फूंक दिया गया. जो राक्षस इस राख से निकला वो दंगाई था, सरेआम प्राइम टाइम शो में मुसलमानों को अपमानित किया जाने लगा, किसानों को पाकिस्तानी एजेंट, देशद्रोही और न जाने क्या क्या कहा गया, विपक्षी नेताओं, पत्रकारों, बुद्धिजीवियों सबको पाकिस्तानी, सोरोस फंडेड या देशद्रोही बताया गया. जो भी सरकार से सवाल पूछ ले बस ये मीडिया उसके पीछे लगा दिया जाता है. स्कूल के बच्चों तक को इन्होंने सोरोस एजेंट और पाकिस्तानी कह डाला. स्टूडियो ने निकलने वाली नफ़रत गली मुहल्लों में पहुंच गई. असर कोर्ट रूम तक चला गया. पूरा देश मानो किसी गृहयुद्ध में हो, नफ़रत ने बचपन के दोस्त खत्म कर दिये, परिवारों में दरारें डाल दी.

भारत में पहली बार मुसलमानों की लिंचिंग शुरू हुई. सांप्रदायिक दंगे पहले भी होते लेकिन उनकी रिपोर्टिंग में सावधानी होती थी. वो सावधानी साफ़ साफ़ हिंदू मुसलमान में तब्दील हो गई. एंकर कट्टर हिंदू बन कर स्टूडियो से ललकारने लगे. इस मीडिया को सिर्फ एक काम के लिए बनाया गया जिसका उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ बीजेपी के लिये पॉलिटिकल ज़मीन तैयार करना और सरकार की जगह विपक्ष को कटघरे में खड़े करना है. लेख लिखे गये, सेमिनार और न जाने कितने कार्यक्रम हुए इस दंगाई मीडिया के विरोध में. सोशल, डिजिटल मीडिया में इसके खिलाफ अभियान चले. इसे गोदी मीडिया की संज्ञा दे दी गई.

भारत की प्रेस फ्रीडम रैंकिंग लगातार गिरती गई और अब 157 तक पहुंच गई. विपक्षी पार्टियों ने भी आधे अधूरे मन से इस मीडिया की आलोचना तो की लेकिन इनके स्टूडियो में बैठकर इस नफ़रत के प्रोजेक्ट की स्वीकार्यता भी बनाये रखी. इस गोदी मीडिया का समाज के प्रति बर्ताव शहर के किसी गुंडे के माफिक है जो सड़क पर निकलता है तो लोग इधर उधर हो जाते हैं, महिलायें घरों के अंदर चली जाती हैं और गुंडा बीच सड़क में बेखौफ चलता है. किसान जब आंदोलन पर उतरे तो उनकी इस मीडिया के प्रति रणनीति विपक्षी पार्टियों जैसी ढुलमुल नहीं थी. किसानों ने इस मीडिया को अपने यहां घुसने नहीं दिया.

फर्क साफ़ है किसान जीत कर घर गये और विपक्ष जीते हुये चुनाव हारता गया इसी मीडिया की वजह से. पहली बार इस मीडिया को ऑनलाइन एजुकेटर्स ने आईना दिखाया है. इन शिक्षकों की भी युवाओं के बीच अच्छी फ़ॉलोइंग है, पढ़े लिखे हैं, रिसर्च हैं इनके पास, कमाई ट्रांसपेरेंट है तो डर भी नहीं है. इसे उसी भाषा में जवाब दे रहे हैं जिसकी ज़रूरत थी. टीचर्स अगर देश को इस संविधान विरोधी और मनुवादी मीडिया से आज़ाद करा देंगे तो वाकई बड़ा उपकार करेंगे.

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