गाजा युद्ध में शामिल रहे पूर्व इज़रायली सैनिक का बड़ा दावा, कहा- “मैं शर्म और पछतावे के साथ लौटा”

गाजा युद्ध में हिस्सा ले चुके एक पूर्व इज़रायली सैनिक ने युद्ध के दौरान देखी गई घटनाओं को लेकर गंभीर दावे किए हैं। ब्रिटिश पत्रिका द इकोनॉमिस्ट को दिए गए एक साक्षात्कार में उसने कहा कि वह युद्ध में यह सोचकर शामिल हुआ था कि वह इज़रायल के इतिहास के सबसे न्यायसंगत युद्ध का हिस्सा बन रहा है, लेकिन गाजा में बिताए गए महीनों ने उसकी सोच पूरी तरह बदल दी।

यह साक्षात्कार इज़रायली संगठन ब्रेकिंग द साइलेंस के माध्यम से किया गया। रिपोर्ट में सैनिक की पहचान सुरक्षा कारणों से “जोनाथन” नाम से की गई है।

पूर्व सैनिक के अनुसार, गाजा में प्रवेश करने के बाद उसकी यूनिट को नागरिकों की सुरक्षा को लेकर स्पष्ट निर्देश नहीं मिले थे। उसने दावा किया कि सैनिकों के बीच यह धारणा थी कि जिन लोगों ने निकासी आदेशों और बमबारी के बाद भी क्षेत्र नहीं छोड़ा, उन्हें संभावित लक्ष्य माना जा सकता है।

सैनिक ने यह भी कहा कि लड़ने की उम्र के फ़िलिस्तीनी पुरुषों को अक्सर संभावित खतरे के रूप में देखा जाता था। उसके मुताबिक, कई बार ऐसे लोग भी मारे गए जो निहत्थे थे और युद्ध की परिस्थितियों में उनकी पहचान की पुष्टि करना संभव नहीं हो पाता था।

अपने बयान में उसने एक और गंभीर आरोप लगाया। उसका दावा है कि कुछ सैन्य अभियानों के दौरान फ़िलिस्तीनी बंदियों को सैनिकों से आगे भेजा जाता था ताकि वे इमारतों की जांच करें और संभावित विस्फोटकों या घात की जानकारी दे सकें। सैनिक के अनुसार, इस प्रक्रिया को सैनिकों के बीच “मॉस्किटो प्रोटोकॉल” कहा जाता था।

उसने बताया कि सैन्य इकाइयों के भीतर इस बात पर कम चर्चा होती थी कि ऐसा करना सही है या गलत, जबकि ज़्यादा ध्यान इस बात पर दिया जाता था कि इस काम के लिए मजबूर किए गए लोगों को कैसे संभाला जाए।

पूर्व सैनिक ने गाजा में बड़े पैमाने पर हुए विनाश का भी जिक्र किया। उसके अनुसार, समय बीतने के साथ कई पैदल सेना इकाइयों का मुख्य काम इमारतों और ढांचों को गिराना बन गया था। हालांकि, कई सैनिक यह नहीं समझ पा रहे थे कि इन कार्रवाइयों का व्यापक रणनीतिक उद्देश्य क्या है।

उसने कहा कि जैसे-जैसे युद्ध आगे बढ़ता गया और घोषित लक्ष्य पूरे होते नहीं दिखे, वैसे-वैसे सैनिकों के बीच सवाल और निराशा बढ़ती गई। उसके मुताबिक, स्पष्ट रणनीति की कमी और लंबे समय तक जारी संघर्ष ने सेना के भीतर भी असंतोष पैदा किया।

पूर्व सैनिक ने इज़रायली मीडिया की भी आलोचना की। उसने कहा कि गाजा में फ़िलिस्तीनियों की पीड़ा का बड़ा हिस्सा जनता तक नहीं पहुंचाया गया। उसके अनुसार, उसने अपनी आंखों से जो देखा और मीडिया में जो दिखाया गया, दोनों के बीच बड़ा अंतर था।

साक्षात्कार के अंत में सैनिक ने कहा कि अब उसे अपनी सैन्य सेवा या अपनी इज़रायली पहचान पर गर्व महसूस नहीं होता। उसने कहा कि गाजा में जो कुछ हुआ, उसे लेकर वह शर्मिंदा है और अब वह अपने घर पर अपने देश का झंडा लगाने की कल्पना भी नहीं कर सकता।

यह रिपोर्ट ब्रिटिश पत्रिका द इकोनॉमिस्ट में प्रकाशित साक्षात्कार में पूर्व सैनिक द्वारा किए गए दावों पर आधारित है।

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