8 दिन तक गैरकानूनी हिरासत में रखा गया, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मंसूर अहमद को 2 लाख रुपये मुआवजा देने का दिया आदेश

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रयागराज के निवासी मंसूर अहमद को आठ दिनों तक अवैध रूप से हिरासत में रखने के मामले में उत्तर प्रदेश सरकार को 2 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि यह हिरासत गैरकानूनी थी और इससे मंसूर अहमद के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ।

न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया। कोर्ट के सामने रखी गई याचिका में बताया गया कि 19 मार्च की रात पुलिसकर्मी मंसूर अहमद को उनके घर से अपने साथ ले गए थे। परिवार का आरोप था कि पुलिस ने हिरासत में लेने की कोई ठोस वजह नहीं बताई। इतना ही नहीं, विरोध करने पर उनकी पत्नी के साथ भी अभद्र व्यवहार किया गया।

परिजनों ने यह भी दावा किया कि हिरासत के दौरान मंसूर अहमद को प्रताड़ना का सामना करना पड़ा, जिसके कारण उनकी शारीरिक हालत काफी बिगड़ गई थी।

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड की जांच की और पाया कि ऐसा कोई सबूत मौजूद नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि मंसूर अहमद ने व्यक्तिगत मुचलका भरने से इनकार किया था। अदालत ने माना कि उन्हें तय कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना लंबे समय तक हिरासत में रखा गया, जो पूरी तरह से कानून के खिलाफ है।

कोर्ट ने राज्य सरकार को छह सप्ताह के भीतर 2 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया है। साथ ही कहा है कि बाद में यह राशि मामले के लिए जिम्मेदार अधिकारी से वसूली जा सकती है।

फैसले में हाईकोर्ट ने प्रयागराज पुलिस प्रशासन के रवैये पर भी कड़ी टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि पुलिस अधिकारियों को दी गई शक्तियों का दुरुपयोग किया जा रहा है और ऐसी घटनाएं कानून के शासन के लिए गंभीर चिंता का विषय हैं। कोर्ट ने पुलिस आयुक्त को मामले में अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का आदेश दिया और चेतावनी दी कि आदेश का पालन नहीं होने पर उन्हें व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होना पड़ सकता है।

इस मामले में हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण सिद्धांत भी सामने रखा। अदालत ने कहा कि किसी भी व्यक्ति को बिना वैध कारण के 24 घंटे से अधिक समय तक हिरासत में रखना अवैध माना जाएगा। ऐसे मामलों में पीड़ित को हिरासत के हर दिन के हिसाब से 25 हजार रुपये तक मुआवजा दिया जा सकता है।

कानूनी जानकारों के अनुसार, यह फैसला मनमानी हिरासत और पुलिस शक्तियों के दुरुपयोग के खिलाफ एक महत्वपूर्ण न्यायिक संदेश है, जो नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा को और मजबूत करता है।

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