लेखक: प्रकाश रे
साल 1967 के बाद पहली बार अल-अक़्सा मस्जिद में रमज़ान के आख़िरी शुक्रवार की नमाज़ नहीं हो सकी है. जेरूसलम के मुस्लिम ईद के मौक़े पर वहाँ नहीं जा सकेंगे. इस परिसर को इज़रायल ने 20 दिनों से बंद रखा है.
साल 661 में इस्लाम के चौथे ख़लीफ़ा हज़रत अली की हत्या के क़रीब छह माह बाद जेरूसलम की अल-अक़्सा मस्जिद में मज़हब के बड़े-बुज़ुर्गों की मौजूदगी में मुआविया को इस्लाम का ख़लीफ़ा घोषित कर दिया गया.
मुआविया के दौर में टेंपल माउंट का इस्लामीकरण हुआ. वहां उसने मस्जिद समेत कई इमारतें बनवाईं और पहले की इमारतों का विस्तार किया. मंदिर प्रांगण के ठीक बीच में उसने एक गुंबद भी बनाया, जिसे डोम ऑफ द चेन या क़ुब्बत-उल-सिलसिला कहा जाता है. इसके बनाने के पीछे क्या कारण था, इसके बारे में निश्चित तौर पर कुछ कहा नहीं जा सकता है. उसके राज में यहूदी टेंपल माउंट पर पूजा भी कर सकते थे.

उम्र की आठवीं दहाई में मुआविया की मौत हो गयी और उसका अय्याश बेटा यज़ीद ख़लीफ़ा बना. यह भी जेरूसलम में टेंपल माउंट पर हुआ. साल 683 में युवा यज़ीद की भी मौत हो गयी. सीरियाई सेना ने उसके एक रिश्तेदार मारवान को इस्लाम का ख़लीफ़ा तय कर दिया. अप्रैल, 685 में मारवान भी चल बसा.
अब उसका बेटा अब्द अल-मलिक नया ख़लीफ़ा था. पर, अभी साम्राज्य की हालत बेहद नाज़ुक थी. दमिश्क़ के ख़लीफ़ा के हाथ से मक्का, इराक़ और फ़ारस निकल चुके थे. उन पर अन्य इस्लामी विद्रोहियों का क़ब्ज़ा था.
उसी के निर्देश पर और देख-रेख में जेरूसलम की वह इमारत बनी, जो आज भी शहर की मुख्य पहचान है, और जेरूसलम पर दावे का केंद्रीय प्रतीक है- डोम ऑफ़ द रॉक यानी क़ुब्बत अल-सख़रा.
साल 691-92 में डोम ऑफ़ द रॉक का काम पूरा होने के तुरंत बाद ही अब्द अल-मलिक ने मक्का, फ़ारस और इराक़ के इलाक़ों को अपने क़ब्ज़े में कर लिया. इस 65 फीट व्यास की इमारत को उसकी भव्यता और इसमें 800 फ़ीट की लिखाई ने जेरूसलम की सबसे शानदार इमारत बना दिया.
साल 705 में पिता की मौत की बाद अल-वलीद सुल्तान बना. इसने भी टेंपल माउंट पर बेहतरीन इमारतें और स्मारक बनाने का सिलसिला जारी रखा. अल-अक़्सा मस्जिद उसी के शासनकाल में बनी थी. दोनों बाप-बेटे ने साल 70 के बाद पहली बार बड़े पुलों, दरवाज़ों और मेहराबों का निर्माण करवाया था. इन ख़लीफ़ाओं ने टेंपल माउंट को पूरी तरह से इस्लामी पहचान के केंद्र के रूप में बदल दिया. इसी के साथ उन दास्तानों का भी बनना-बिगड़ना जारी रहा, जिनसे जेरूसलम के आज के मिथक भी जुड़े हुए हैं.
साल 757 में हज कर मक्का से कूफ़ा लौटते हुए अब्बासी ख़लीफ़ा मंसूर जेरूसलम आया. गृहयुद्धों और वित्तीय संकट ने शहर को लगभग वीरान बना दिया था. साल 747 के भयावह भूकंप से क्षतिग्रस्त इमारतें मरम्मत की बाट जोह रही थीं. मंसूर ने अल-वालिद की बनायी अल-अक़्सा मस्जिद की मरम्मत तो करायी, पर इसके ख़र्च के लिए उसने डोम ऑफ द रॉक के सोने-चांदी को पिघला दिया.
लेकिन 771 के भूकंप ने फिर इसे तबाह कर दिया. तीसरे अब्बासी ख़लीफ़ा अल महदी ने मस्जिद को न सिर्फ दुरुस्त कराया, बल्कि उसे बड़ा विस्तार भी दिया. इसी दौर में इसका नाम अल-अक़्सा पड़ा.
पैगंबर मुहम्मद के साथ जुड़ जाने तथा डोम ऑफ द रॉक के बनने के बाद इस्लामी आध्यात्म में इस शहर का आकर्षण लगातार बढ़ता जा रहा था. इसी खिंचाव में सूफ़ियों का रेला इस शहर का बाशिंदा बना, जिसमें सूफ़ीवाद के संस्थापकों में एक माने जाने वाले अबु इशाक इब्राहिम इब्न अदम भी शामिल थे. अल-अक़्सा मस्जिद की मरम्मत के दौरान ही मशहूर महिला सूफ़ी राबिया का देहांत जेरूसलम में हुआ.
कस्तुनतुनिया के ख़िलाफ़ एक अभियान के दौरान ख़लीफ़ा मामून 831 में सीरिया आया और उसने जेरूसलम की यात्रा की. उसने टेम्पल माउंट पर एक नये दरवाज़े की तामीर ज़रूर करायी, लेकिन डोम ऑफ़ रॉक के सोने की चादर भी उसने उतार ली.
हज़ार साल से ज़्यादा वक़्त तक वह सुनहरा गुम्बद धूसर दिखता रहा था. उसकी सुनहरी चमक 1960 के दशक में तो वापस आ गयी, पर मामून द्वारा अब्द अल-मलिक का जो नाम उस इमारत से मिटाया गया था, उसे नहीं हटाया गया. वह आज भी मौजूद है. लेकिन उसके नाम के साथ जो तारीख़ दर्ज है, वह उमय्यद ख़लीफ़ा अल-मलिक के वक़्त की है.
साल 832 में उसने जेरूसलम के सम्मान में एक नया सिक्का जारी किया, जिस पर ‘अल क़ुद्स’ लिखा गया, जिसका मतलब था- पवित्र. यह जेरूसलम का नया इस्लामी नाम था.

जेरूसलम को पहले क्रूसेड में 1099 में ईसाई क्रूसेडरों ने क़ब्ज़ा कर लिया. डोम ऑफ़ द रॉक ऑगस्टिनियंस को दिया गया था, जिसने इसे चर्च में बदल दिया था. अल-अक़्सा मस्जिद पहले कुछ समय के लिए एक शाही रिहायश रही और फिर 12वीं सदी में वहाँ नाइट्स टेम्पलर का मुख्यालय चलता रहा.
जेरूसलम पर 2 अक्टूबर 1187 को सलादीन का क़ब्ज़ा हुआ और डोम ऑफ़ द रॉक फिर से एक मुस्लिम इमारत बन गई. गुंबद के ऊपर से सलीब के चिह्न को हटाकर चाँद का प्रतीक लगा दिया गया. सोलहवीं सदी में उस्मानिया शासक सुलेमान के दौर में इस परिसर की व्यापक मरम्मत हुई.
उस्मानिया, ब्रिटिश और जॉर्डन के नियंत्रण के दौरान परिसर की देख-भाल और मरम्मत होती रही. साल 1967 के युद्ध के दौरान कुछ समय के लिए डोम पर इज़रायली झंडा लगाया गया था, पर तुरंत उसे हटा दिया गया और इज़रायल ने इस परिसर को मुस्लिम समुदाय को दे दिया. साल 1993 में डोम पर सोने की परत चढ़ाने के लिए जॉर्डन के शाह हुसैन ने 80 किलो सोना दिया था. इस परिसर की ज़िम्मेदारी जॉर्डन की है और जॉर्डन के राजा इसके मुख्य कस्टोडियन हैं.
