उत्तर प्रदेश की राजनीति में बहुजन-मुस्लिम गठबंधन के अग्रदूत: डॉ अब्दुल जलील फरीदी

डॉ काझी रफ़ीक़ “राही”

उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपनी अमीट छाप छोड़ने वाले दूरदर्शी राजनीतिज्ञ डॉ जलील फरीदी जाति शास्त्र में माहिर थे। उनके राजनीतिक जीवन और राजनीतिक योगदान पर शोध निबंध

डॉ फरीदी की राजनीतिक दृष्टि सांप्रदायिक राजनीति से परे थी। उन्होंने माना कि मुसलमानों को एक सांप्रदायिक राजनीतिक पार्टी की आवश्यकता नहीं है। बल्कि, उन्हें सामाजिक न्याय और आर्थिक समानता के लिए लड़ने वाले व्यापक बहुजन गठबंधन का हिस्सा बनना चाहिए।

उनका मानना था कि जाति राजनीति को समझना और उसका उपयोग करना आवश्यक है। भारतीय समाज की जातिगत संरचना की उनकी गहरी समझ ने उन्हें यह महसूस कराया कि वंचित वर्गों की एकता ही एकमात्र तरीका है जिससे सामाजिक न्याय प्राप्त किया जा सकता है।

डॉ अब्दुल जलील फरीदी (14 दिसंबर 1913 – 19 मई 1974) स्वतंत्र भारत के मुस्लिम राजनीति के इतिहास में एक असाधारण व्यक्तित्व थे[1][2]। वे न केवल एक दूरदर्शी राजनेता थे, बल्कि एक प्रतिष्ठित चिकित्सक, स्वतंत्रता सेनानी और समाजसेवी भी थे। उत्तर प्रदेश की राजनीति में उनका सबसे महत्वपूर्ण योगदान मुस्लिम और बहुजन समाज के बीच राजनीतिक गठबंधन की संभावनाओं को तलाशना था, जो उस समय की राजनीतिक समझ से काफी आगे की सोच थी[2][3]।

प्रारंभिक जीवन और शैक्षणिक पृष्ठभूमि

डॉ फरीदी का जन्म 1913 में ग़ाज़ीपुर, उत्तर प्रदेश में एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था[4]। उनके पूर्वज प्रसिद्ध सूफी संत हज़रत बाबा फरीदुद्दीन गंजशकर से संबंध रखते थे, जो मुल्तान से थे[5]। उन्होंने लखनऊ के क्रिश्चियन कॉलेज और फिर लखनऊ मेडिकल कॉलेज से शिक्षा प्राप्त की[6][7]। प्रारंभ से ही राजनीति में रुचि रखने के बावजूद, उन्होंने चिकित्सा के क्षेत्र में विशेषज्ञता हासिल की और तपेदिक (टीबी) के उपचार में देश के अग्रणी विशेषज्ञों में से एक बन गए[8][9]।

चिकित्सा व्यवसाय और सामाजिक सेवा

डॉ फरीदी एक अत्यंत सफल चिकित्सक थे और लखनऊ में उनकी बहुत ऊंची हैसियत थी[8][9]। वे टीबी के प्रमुख विशेषज्ञों में से एक थे, जो उस समय एक भयानक बीमारी मानी जाती थी[10]। यहां तक कि उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री सुचेता कृपलानी भी उनके पास इलाज के लिए आती थीं[10]। उनकी चिकित्सा सेवाओं की प्रतिष्ठा केवल समुदाय के भीतर ही नहीं बल्कि समाज के सभी वर्गों में थी[8][9]।

चिकित्सा पेशे से भारी कमाई के बावजूद, डॉ फरीदी ने अपने जीवन को सामाजिक सेवा और गरीबों की मदद के लिए समर्पित कर दिया[2]। वे बहुत से मरीजों का मुफ्त इलाज करते थे और अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा वंचित वर्गों की सहायता में लगाते थे[2]। यदि वे अवसरवाद को अपनाते, तो उस समय की सबसे मजबूत राजनीतिक पार्टी कांग्रेस द्वारा उन्हें उच्च पदों से सम्मानित किया जा सकता था, और वे संभवतः देश के उपराष्ट्रपति या राष्ट्रपति के पद तक पहुंच सकते थे[8][9]।

राजनीतिक सफर की शुरुआत

डॉ फरीदी ने 1951 में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी (PSP) में शामिल होकर अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की[1][3]। वे पार्टी के विधान परिषद में नेता बने और 12 अगस्त 1959 से 28 मार्च 1960 तक उत्तर प्रदेश विधान परिषद में प्रतिपक्ष के नेता रहे[11]। उन्होंने लखनऊ नगर निगम के सदस्य के रूप में भी काम किया[6][12]।

1960 के दशक में, डॉ फरीदी समाजवादी पार्टियों की राजनीति से मोहभंग हो गए[3]। उन्होंने महसूस किया कि ये पार्टियां विपक्ष में रहते हुए मुसलमानों और अन्य वंचित समुदायों के लिए आवाज़ उठाती थीं, लेकिन सत्ता में आने के बाद कुछ नहीं करती थीं[3]। इस अनुभव ने उनकी राजनीतिक सोच को एक नई दिशा दी।

ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिस-ए-मुशावरत की स्थापना

1961 के बाद देश में सांप्रदायिक दंगों की श्रृंखला, विशेष रूप से जबलपुर दंगे, और सरकार की कार्रवाई करने में असमर्थता ने मुस्लिम समुदाय को गहराई से प्रभावित किया[10]। इस पृष्ठभूमि में, 1964 में डॉ फरीदी ने बिहार के कांग्रेसी नेता सैयद महमूद के साथ मिलकर ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिस-ए-मुशावरत की स्थापना की[1][13]। यह एक छत्र संगठन था जो विभिन्न मुस्लिम संगठनों को एक मंच पर लाने का प्रयास था[13]।

मजलिस-ए-मुशावरत 1967 के चुनावों में सक्रिय रूप से शामिल हुई और बड़ी संख्या में उम्मीदवारों का समर्थन किया[14][15]। केवल उत्तर प्रदेश में ही 38 विधायक और 2 सांसद इसके समर्थन से चुने गए[14]।

सम्युक्त विधायक दल से अलगाव

1967 के विधानसभा चुनावों के बाद, उत्तर प्रदेश में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार बनी, जिसमें सम्युक्त विधायक दल (SVD) का गठबंधन था[16][17]। यह गठबंधन भारतीय जनसंघ, समयुक्त समाजवादी पार्टी, प्रजा समाजवादी पार्टी, स्वतंत्र पार्टी और कांग्रेस के विद्रोहियों से मिलकर बना था, जिसमें चरण सिंह मुख्यमंत्री बने[16][17]।

डॉ फरीदी इस गठबंधन का हिस्सा थे, लेकिन जल्द ही उन्हें एहसास हुआ कि यह गठबंधन मुसलमानों और वंचित वर्गों के मुद्दों को प्रभावी ढंग से संबोधित नहीं कर रहा है। सम्युक्त विधायक दल में आंतरिक कलह और नीतिगत मतभेदों ने उन्हें निराश किया[18][19]।

ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिस की स्थापना

1968 में, सम्युक्त विधायक दल में विभाजन के बाद, डॉ फरीदी ने एक स्वतंत्र राजनीतिक दल – ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिस की स्थापना की[1][18][3]। यह उनके राजनीतिक जीवन का सबसे महत्वपूर्ण कदम था।

मुस्लिम मजलिस की स्थापना केवल सांप्रदायिक हितों के लिए नहीं बल्कि एक व्यापक सामाजिक न्याय के एजेंडे के साथ की गई थी[3]। डॉ फरीदी का विचार था कि भारत एक ऐसा देश है जहां 85% OBC (अन्य पिछड़ा वर्ग), अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वाले लोग 15% उच्च जातियों द्वारा शासित हैं[3][20]। उनका एजेंडा धन का समान वितरण, शिक्षा और रोजगार के अवसर शामिल था[3]।

मुस्लिम-बहुजन गठबंधन की परिकल्पना: जातिशास्त्र में महारत

डॉ फरीदी जाति शास्त्र में माहिर थे और उन्होंने भारतीय समाज की जातिगत संरचना की गहरी समझ विकसित की थी[1][3]। वे पहले मुस्लिम नेता थे जिन्होंने मुसलमानों और बहुजन समाज (OBC, SC, ST) के बीच राजनीतिक गठबंधन की संभावनाओं को व्यवस्थित रूप से तलाशा[2][3]।

उनका तर्क था कि मुसलमान भी जातिगत स्तरीकरण के शिकार हैं। मुस्लिम समाज में लगभग 85% पसमांदा (पिछड़े और दलित मुस्लिम) हैं, जबकि केवल 15% अशराफ (उच्च वर्ग) मुसलमान हैं[20][21]। इसलिए, मुसलमानों और हिंदू बहुजन समाज के बीच आर्थिक और सामाजिक हितों में समानता है[3]।

डॉ फरीदी ने 85% बनाम 15% की अवधारणा को लोकप्रिय बनाया – यह विचार कि यदि 85% वंचित वर्ग (सभी धर्मों के) एकजुट हो जाएं, तो वे 15% उच्च जातियों के वर्चस्व को तोड़ सकते हैं[3][20][22]। यह अवधारणा बाद में कांशीराम और बहुजन समाज पार्टी की राजनीति का आधार बनी[2][3][23]।

पेरियार के साथ ऐतिहासिक सम्मेलन (1968)

1968 में, डॉ फरीदी ने लखनऊ में एक महत्वपूर्ण सम्मेलन का आयोजन किया, जिसमें तमिलनाडु के प्रसिद्ध समाज सुधारक और द्रविड़ आंदोलन के नेता पेरियार ई.वी. रामासामी ने भाग लिया[1][24][3]। यह “अल्पसंख्यक और पिछड़ा वर्ग सम्मेलन” 12 अक्टूबर 1968 को लखनऊ के कैसरबाग में बारहदरी में आयोजित किया गया था[24]।

इस सम्मेलन में पेरियार के साथ अन्य प्रमुख दलित नेता भी उपस्थित थे, जिनमें डॉ. छेदीलाल साथी, डॉ. दौजी गुप्ता, डॉ. गया प्रसाद प्रशांत, और शिवदयाल सिंह चौरसिया शामिल थे[24]। यह भारतीय राजनीति में एक ऐतिहासिक क्षण था क्योंकि इसने पहली बार मुस्लिम और बहुजन नेतृत्व को एक मंच पर लाया[24][3]।

पेरियार ने लखनऊ में अपने भाषण में कहा: “हमारे नेता पुरानी धार्मिक और सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखना चाहते हैं, जैसा कि पहले था। इसे अभी भी जबरदस्ती थोपा जा रहा है। इससे मानवता दूर है। समतावादी समाज की स्थापना असंभव है।”[24]

इस सम्मेलन ने मुस्लिम-दलित एकता की नींव रखी और बहुजन राजनीति के लिए मार्ग प्रशस्त किया[2][3][25]।

राजनीतिक गठबंधन और चुनावी राजनीति

मुस्लिम मजलिस ने विभिन्न राजनीतिक दलों के साथ चुनावी गठबंधन किए। 1977 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में, मुस्लिम मजलिस के दो उम्मीदवार जनता पार्टी के चिन्ह पर जीते[18][26]।

डॉ फरीदी ने हमेशा गठबंधन की राजनीति में विश्वास किया, लेकिन वे सिद्धांतवादी थे और अपनी शर्तों पर समझौता नहीं करते थे[6]। 1971 में, उन्होंने इंदिरा गांधी के साथ बातचीत की और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) के अल्पसंख्यक चरित्र को बहाल करने के वादे के बदले में चुनावी समर्थन देने पर सहमति व्यक्त की[6][27]। लेकिन जब ये वादे जल्द ही भुला दिए गए, तो डॉ फरीदी गहराई से निराश हुए और अपनी पहले की स्वतंत्र राजनीति की ओर लौटने के लिए तैयार थे[6]।

मुस्लिम समुदाय के मुद्दों पर आवाज़

डॉ फरीदी स्वतंत्रता के बाद पहले मुस्लिम नेता थे जिन्होंने साहसपूर्वक मुस्लिम समुदाय के करीबी मुद्दों के बारे में बोलने की हिम्मत की: भेदभाव, सामाजिक-आर्थिक समस्याएं, AMU के अल्पसंख्यक चरित्र का मुद्दा, उर्दू के लिए सही स्थान, आदि[6][28]।

उस समय कई गंभीर मुद्दे थे जिन पर डॉ फरीदी ने आवाज़ उठाई:

  1. ‘कस्टोडियन’ और भूमि संबंधी मुद्दे: विभाजन के बाद, मुसलमानों की संपत्तियों को ‘कस्टोडियन’ द्वारा जब्त करने के मामले आम थे[10]।
  2. सांप्रदायिक दंगों की श्रृंखला: 1960 के दशक में बार-बार होने वाले दंगों ने मुस्लिम समुदाय को असुरक्षित बना दिया था[10][28]।
  3. PAC (प्रांतीय सशस्त्र कांस्टेबुलरी) की ज्यादतियां: उत्तर प्रदेश में PAC द्वारा मुसलमानों के खिलाफ की जाने वाली हिंसा एक गंभीर मुद्दा था[10][29]।
  4. नौकरियों में पक्षपात: सरकारी नौकरियों में मुसलमानों के खिलाफ बढ़ते पूर्वाग्रह की समस्या थी[10]।
  5. उर्दू की स्थिति: उर्दू भाषा को क्षेत्रीय भाषा के रूप में मान्यता देने के लिए डॉ फरीदी ने जोरदार अभियान चलाया[30]। उर्दू पत्रकारिता: ‘क़ायद’ अखबार की स्थापना

डॉ फरीदी ने ‘क़ायद’ (नेता) नामक एक उर्दू दैनिक समाचार पत्र की स्थापना की[1][31]। इस अखबार का उद्देश्य मुसलमानों और समाज के अन्य दबे-कुचले लोगों की आवाज़ और समस्याओं को उजागर करना था[31]। ‘क़ायद’ ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और मुस्लिम समुदाय के मुद्दों को मुख्यधारा की चर्चा में लाया।

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के अल्पसंख्यक चरित्र के लिए संघर्ष

डॉ फरीदी AMU के अल्पसंख्यक चरित्र की बहाली के संघर्ष में प्रमुख प्रचारक और अग्रणी सेनानी थे[8][9][27]। यह उनके राजनीतिक जीवन का एक केंद्रीय मुद्दा था। उन्होंने 1965-1981 की अवधि के दौरान AMU के अल्पसंख्यक दर्जे के अभियान का नेतृत्व किया[27]।

AMU छात्र संघ हॉल में उनका चित्र लगा हुआ है, लेकिन दुर्भाग्य से, आज की पीढ़ी इस महान व्यक्तित्व से अनजान है[8][9]। उनकी ईमानदारी, समर्पण और समुदाय के लिए बलिदानों में उनका कोई मुकाबला नहीं था[8][9]।

कांशीराम के बहुजन आंदोलन पर प्रभाव

डॉ फरीदी के प्रयासों ने बहुजन राजनीति की नींव रखी, जिसे बाद में कांशीराम और बहुजन समाज पार्टी (BSP) ने आगे बढ़ाया[2][3][23]। कांशीराम की 85% बहुजन समाज की अवधारणा सीधे तौर पर डॉ फरीदी के 85% बनाम 15% के विचार से प्रभावित थी[3][20][23]।

इतिहासकारों और राजनीतिक विश्लेषकों ने स्वीकार किया है कि डॉ फरीदी कांशीराम से पहले के अग्रदूत थे और उन्होंने ही पहली बार सभी धर्मों के वंचित वर्गों के राजनीतिक संघ का विचार प्रस्तुत किया[3][23]।

1971 का ऑल इंडिया मुस्लिम पॉलिटिकल कन्वेंशन

दिसंबर 1971 में, डॉ फरीदी ने नई दिल्ली में ऑल इंडिया मुस्लिम पॉलिटिकल कन्वेंशन का नेतृत्व किया[1]। यह सम्मेलन देश भर के मुस्लिम राजनीतिक नेताओं को एक मंच पर लाने का एक महत्वपूर्ण प्रयास था। इसने मुस्लिम समुदाय के राजनीतिक सशक्तिकरण और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए एक व्यापक रणनीति विकसित करने का प्रयास किया।

राजनीतिक प्रभाव और विरासत

डॉ फरीदी ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक अमिट छाप छोड़ी। मुस्लिम मजलिस 1970 के दशक में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक शक्ति बन गई, जो कांग्रेस को भी चुनौती देती थी[8][9]। इतने कम समय में जिस तेज़ी से यह एक राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरी, वह आज के राजनीतिक और सामाजिक वातावरण में कल्पना से परे है[8][9]।

डॉ फरीदी के राजनीतिक प्रयोगों से कई नेताओं ने सीखा। 1970 और 1980 के दशक में उभरे अधिकांश प्रमुख नेता, जिनमें आज़म खान और आलम बदीउल आज़मी शामिल हैं, ने राजनीति की बुनियादी बातें डॉ फरीदी से सीखीं या शुरुआत में मजलिस के कोटे पर आवंटित सीटों से चुनाव लड़े[10][32][33]। आलम बदीउल आज़मी 1990 के दशक के अंत में आज़मगढ़ से मुस्लिम मजलिस के कोटे पर जीते थे[10]।

इलियास आज़मी, जो दो बार सांसद रहे, डॉ फरीदी की विचारधारा के प्रमुख ध्वजवाहकों में से एक थे[33][34][35]। उन्होंने हमेशा डॉ फरीदी की याद को जीवित रखा और उनके विचारों को आगे बढ़ाने का प्रयास किया[34][35]।

राजनीतिक चुनौतियां और निराशाएं

डॉ फरीदी का राजनीतिक जीवन चुनौतियों से भरा था। मजलिस-ए-मुशावरत के भीतर चुनावों में भाग लेने के मुद्दे पर मतभेद थे। डॉ फरीदी चुनावों में भाग लेने के विचार का जोरदार समर्थन करते थे, जबकि डॉ सैयद महमूद इसका विरोध करते थे[13]।

1971 में इंदिरा गांधी के साथ किए गए वादे जब पूरे नहीं हुए, तो डॉ फरीदी गहराई से निराश हुए[6]। उन्होंने महसूस किया कि मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियां मुस्लिम समुदाय के साथ वादाखिलाफी करती हैं।

मृत्यु और श्रद्धांजलि

19 मई 1974 को, 1974 के विधानसभा चुनावों से ठीक पहले, कठोर चुनाव प्रचार के दौरान डॉ फरीदी का दिल का दौरा पड़ने से असामयिक निधन हो गया[36][35]। उनकी मृत्यु उत्तर प्रदेश की राजनीति और विशेष रूप से मुस्लिम समुदाय के लिए एक बड़ा नुकसान थी।

भूली हुई विरासत

यह एक दुखद वास्तविकता है कि डॉ फरीदी जैसी असाधारण उपलब्धि वाले व्यक्ति को न केवल मुस्लिम समुदाय ने बल्कि उन लोगों ने भी भुला दिया है जिनके साथ उन्होंने व्यक्तिगत एहसान किए थे[8][9]। आज की युवा पीढ़ी इस उल्लेखनीय व्यक्तित्व से अनजान है[8][9]।

डॉ फरीदी की निस्वार्थता, ईमानदारी और प्रतिबद्धता में आज के मुस्लिम राजनेताओं के लिए कोई मुकाबला नहीं है[8][9]। वर्तमान राजनीतिक और सामाजिक वातावरण में यह असंभव लगता है[8][9]। यदि डॉ फरीदी अवसरवाद को अपनाते, तो उनके पास देश के उपराष्ट्रपति या राष्ट्रपति के पद पर पहुंचने का अवसर था, लेकिन उन्होंने अपने सिद्धांतों के साथ समझौता नहीं किया[8][9]।

राजनीतिक दर्शन और जाति राजनीति

डॉ फरीदी की राजनीतिक दृष्टि सांप्रदायिक राजनीति से परे थी। उन्होंने माना कि मुसलमानों को एक सांप्रदायिक राजनीतिक पार्टी की आवश्यकता नहीं है[3]। बल्कि, उन्हें सामाजिक न्याय और आर्थिक समानता के लिए लड़ने वाले व्यापक बहुजन गठबंधन का हिस्सा बनना चाहिए[3]।

उनका मानना था कि जाति राजनीति को समझना और उसका उपयोग करना आवश्यक है। भारतीय समाज की जातिगत संरचना की उनकी गहरी समझ ने उन्हें यह महसूस कराया कि वंचित वर्गों की एकता ही एकमात्र तरीका है जिससे सामाजिक न्याय प्राप्त किया जा सकता है[3][20]।

उर्दू भाषा और संस्कृति के संरक्षक

डॉ फरीदी उर्दू भाषा और मुस्लिम संस्कृति के मजबूत समर्थक थे। उन्होंने उर्दू को उत्तर प्रदेश में क्षेत्रीय भाषा के रूप में मान्यता देने के लिए अभियान चलाया[30]। उन्होंने महसूस किया कि भाषा केवल संचार का माध्यम नहीं है, बल्कि यह एक समुदाय की पहचान और संस्कृति का अभिन्न अंग है[30]।

1966 में, उन्होंने उत्तर प्रदेश में उर्दू को क्षेत्रीय भाषा के रूप में मान्यता देने की मांग की[30]। यह उनके राजनीतिक एजेंडे का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था और इसने मुस्लिम समुदाय में व्यापक समर्थन प्राप्त किया।

डॉ अब्दुल जलील फरीदी स्वतंत्र भारत के मुस्लिम राजनीति के इतिहास में एक विशाल व्यक्तित्व थे। वे एक दूरदर्शी नेता थे जिन्होंने अपने समय से कहीं आगे की सोच रखी। मुस्लिम और बहुजन समाज के बीच राजनीतिक गठबंधन की उनकी परिकल्पना ने उत्तर प्रदेश और व्यापक रूप से भारतीय राजनीति को गहराई से प्रभावित किया[2][3][23]।

उन्होंने जाति शास्त्र में अपनी विशेषज्ञता का उपयोग करते हुए यह दिखाया कि सामाजिक न्याय और आर्थिक समानता की लड़ाई सांप्रदायिक सीमाओं से परे जाती है[3][20]। उनके द्वारा प्रस्तुत 85% बनाम 15% की अवधारणा ने कांशीराम के बहुजन आंदोलन और बाद में BSP की राजनीति के लिए वैचारिक आधार प्रदान किया[2][3][23]।

1968 में पेरियार के साथ उनका ऐतिहासिक सम्मेलन भारतीय राजनीति में एक मील का पत्थर था, जिसने पहली बार मुस्लिम और बहुजन नेतृत्व को एक मंच पर लाया[1][24][3]। इस सम्मेलन ने सामाजिक न्याय की राजनीति के लिए एक नई दिशा स्थापित की।

डॉ फरीदी का जीवन त्याग, समर्पण और सिद्धांतवादी राजनीति का एक उदाहरण था। एक सफल चिकित्सक होते हुए भी उन्होंने अपना जीवन समाज के वंचित वर्गों की सेवा में समर्पित कर दिया[2][8][9]। उन्होंने कभी भी व्यक्तिगत लाभ के लिए अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया[8][9]।

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि उनके असाधारण योगदान के बावजूद, डॉ फरीदी को आज काफी हद तक भुला दिया गया है[8][9]। आज की युवा पीढ़ी, विशेष रूप से मुस्लिम समुदाय में, इस महान नेता से अनजान है[8][9]। उनकी स्मृति को जीवित रखना और उनके विचारों को आगे बढ़ाना हमारी जिम्मेदारी है।

डॉ फरीदी ने जो राजनीतिक दृष्टि प्रस्तुत की – सभी धर्मों के वंचित वर्गों की एकता, जाति और वर्ग के आधार पर गठबंधन, और सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष – आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी उनके समय में थी[2][3][20]। उनकी विरासत हमें याद दिलाती है कि सच्ची राजनीति सेवा, त्याग और सिद्धांतों पर आधारित होनी चाहिए, न कि व्यक्तिगत लाभ पर[8][9]।

डॉ अब्दुल जलील फरीदी की कहानी न केवल उत्तर प्रदेश के राजनीतिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है, बल्कि यह भारत में सामाजिक न्याय और समावेशी राजनीति के संघर्ष का भी एक प्रेरक उदाहरण है। उनकी जीवनी और राजनीतिक योगदान को संदर्भ ग्रंथों में उचित स्थान मिलना चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ियां इस महान नेता से सीख सकें और उनके दिखाए मार्ग पर चल सकें।

The feature image is AI-generated.

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