श्रीलंका में 2019 के ईस्टर संडे बम धमाकों के मामले में एक अहम और चौंकाने वाली कार्रवाई हुई है। आपराधिक जांच विभाग ने पूर्व स्टेट इंटेलिजेंस सर्विस यानी (SIS) प्रमुख, रिटायर्ड मेजर-जनरल सुरेश सल्ले को गिरफ़्तार कर लिया है।
पुलिस अधिकारियों के मुताबिक, सल्ले को बुधवार तड़के राजधानी कोलंबो के एक उपनगर से हिरासत में लिया गया। उन पर आरोप है कि उन्होंने 2019 में हुए समन्वित आत्मघाती हमलों की साज़िश में भूमिका निभाई और हमलावरों की मदद की।
क्या हुआ था 2019 में?
21 अप्रैल 2019 को ईस्टर के दिन श्रीलंका में कई चर्चों और लक्ज़री होटलों को निशाना बनाकर आत्मघाती धमाके किए गए थे। इन हमलों में 279 लोगों की मौत हुई थी, जिनमें 45 विदेशी नागरिक भी शामिल थे। 500 से अधिक लोग घायल हुए थे। इस घटना से देश की राजनीति और पर्यटन आधारित अर्थव्यवस्था पर गहरा असर पड़ा था।
शुरुआत में इन हमलों के लिए एक स्थानीय उग्रवादी समूह को जिम्मेदार बताया गया था। लेकिन बाद में खुफिया तंत्र की विफलता और संभावित राजनीतिक संबंधों को लेकर सवाल उठने लगे।
सल्ले पर क्या आरोप हैं?
साल 2023 में ब्रिटिश ब्रॉडकास्टर चैनल 4 की एक जांच रिपोर्ट में दावा किया गया था कि सुरेश सल्ले का हमलावरों से पहले से संपर्क था। एक व्हिसलब्लोअर ने आरोप लगाया कि 2019 के राष्ट्रपति चुनाव को प्रभावित करने के लिए हमलों को होने दिया गया।
धमाकों के कुछ ही दिनों बाद गोतबाया राजपक्षे ने राष्ट्रपति पद के लिए अपनी उम्मीदवारी घोषित की थी और बाद में राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर चुनाव जीत लिया था। उनकी जीत के बाद सुरेश सल्ले को SIS का प्रमुख नियुक्त किया गया। वह 2024 तक इस पद पर रहे।
बाद में नव-निर्वाचित राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके ने उन्हें पद से हटा दिया और हमलों के लिए जिम्मेदार लोगों को जवाबदेह ठहराने का वादा किया। हालांकि, सुरेश सल्ले ने अपने ऊपर लगे सभी आरोपों से इनकार किया है।
पहले भी उठ चुके हैं सवाल
अलग-अलग जांचों में यह सामने आया था कि भारतीय खुफिया एजेंसियों ने संभावित हमले की चेतावनी दी थी, लेकिन उस पर समय रहते कार्रवाई नहीं की गई।
साल 2023 में श्रीलंका के सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व राष्ट्रपति मैथ्रिपाला सिरिसेना और कई वरिष्ठ अधिकारियों को हमलों को रोकने में विफल रहने का जिम्मेदार ठहराया और पीड़ित परिवारों को मुआवज़ा देने का आदेश दिया। इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र ने भी श्रीलंका सरकार से पहले की जांच रिपोर्टों को सार्वजनिक करने की अपील की है।
क्या कहते हैं नेता?
राष्ट्रपति के वकील और सांसद मोहम्मद निज़ाम करियप्पर ने कहा कि सुरेश सल्ले की गिरफ़्तारी इस बात का संकेत है कि ये हमले सिर्फ धार्मिक उग्रवाद का मामला नहीं थे। उनके मुताबिक, यह एक सुनियोजित साज़िश थी, जिसमें धार्मिक भावनाओं का इस्तेमाल राजनीतिक फायदे के लिए किया गया।
करीब सात साल बाद भी 2019 के ईस्टर धमाकों को लेकर सवाल बाकी हैं। अब सबकी निगाहें इस बात पर हैं कि जांच में आगे क्या सामने आता है और क्या इस मामले में पूरी सच्चाई सामने आ पाएगी।
