देश में पिछले कई वर्षों से हेट स्पीच यानी नफ़रती भाषण को लेकर जारी बहस के बीच सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फ़ैसला सुनाया है। अदालत ने साफ़ कर दिया है कि हेट स्पीच से निपटने के लिए भारत में पहले से मौजूद क़ानूनी प्रावधान पर्याप्त हैं और नए कानून बनाने का आदेश देना अदालत का काम नहीं है।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने 29 अप्रैल 2026 को यह फ़ैसला सुनाते हुए उन कई याचिकाओं को ख़ारिज कर दिया जिनमें नेताओं, धार्मिक सभाओं और मीडिया रिपोर्टिंग से जुड़े कथित नफ़रती बयानों पर कार्रवाई की माँग की गई थी।
यह मामला सिर्फ़ कानूनी बहस तक सीमित नहीं था, बल्कि पिछले कुछ वर्षों के सबसे विवादित बयानों और सांप्रदायिक तनाव से जुड़े मामलों को भी छूता था। अदालत के सामने अनुराग ठाकुर, परवेश वर्मा, हरिद्वार धर्म संसद, ‘यूपीएससी जिहाद’ कार्यक्रम और कोरोना काल में तबलीग़ी जमात को लेकर की गई रिपोर्टिंग जैसे चर्चित मामले मौजूद थे।
कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा कि अगर किसी मामले में संज्ञेय अपराध बनता है तो पुलिस के लिए एफ़आईआर दर्ज करना अनिवार्य है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि हेट स्पीच के मामलों में एफ़आईआर दर्ज करने के लिए किसी विशेष अनुमति की ज़रूरत नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि अगर पुलिस शिकायत के बावजूद कार्रवाई नहीं करती, तो पीड़ित व्यक्ति वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों, मजिस्ट्रेट, हाई कोर्ट और अंततः सुप्रीम कोर्ट तक जा सकता है।
हालाँकि अदालत ने यह भी कहा कि वह हर मामले की लगातार निगरानी नहीं कर सकती और कानून लागू करवाना मुख्य रूप से पुलिस और प्रशासन की ज़िम्मेदारी है।
किन मामलों पर थी सबसे ज़्यादा चर्चा?
सुनवाई के दौरान कई बड़े मामलों का ज़िक्र हुआ। इनमें बीजेपी नेताओं अनुराग ठाकुर और परवेश वर्मा के सीएए विरोधी आंदोलन के दौरान दिए गए बयान शामिल थे। याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि इन भाषणों ने सांप्रदायिक तनाव बढ़ाया।
इसके अलावा हरिद्वार और दिल्ली की धर्म संसदों में दिए गए कथित भड़काऊ भाषण भी अदालत के सामने थे, जहाँ कुछ वक्ताओं पर मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत फैलाने के आरोप लगे थे।
सुदर्शन टीवी के ‘यूपीएससी जिहाद’ कार्यक्रम का मामला भी इस सुनवाई का हिस्सा था। कार्यक्रम में दावा किया गया था कि यूपीएससी परीक्षा में मुसलमानों को विशेष लाभ दिया जाता है। बाद में इस दावे को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 2020 में कार्यक्रम के आगे प्रसारण पर रोक लगा दी थी।
कोरोना महामारी के दौरान तबलीग़ी जमात को लेकर कई टीवी चैनलों की रिपोर्टिंग के ख़िलाफ़ भी अदालत में याचिकाएँ दायर हुई थीं। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि इस तरह की रिपोर्टिंग ने एक समुदाय के ख़िलाफ़ नफ़रत फैलाने का काम किया।
चार मामलों में अब भी जारी रहेगी सुनवाई
हालाँकि अधिकांश याचिकाएँ ख़ारिज कर दी गईं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने चार मामलों में सुनवाई जारी रखने का फ़ैसला लिया है।
इनमें डीएमके नेता उदयनिधि स्टालिन और केरल विधानसभा के स्पीकर ए.एन. शमशीर से जुड़े मामले शामिल हैं। इन पर आरोप है कि उनके बयानों से धार्मिक भावनाएँ आहत हुईं और सांप्रदायिक तनाव बढ़ सकता था।
इसके अलावा गुंटूर के मेयर कवाती मनोहर नायडू और अजमेर शरीफ़ दरगाह से जुड़े एक अन्य मामले में भी अदालत सुनवाई करेगी, क्योंकि प्रशासन ने अब तक अदालत को यह नहीं बताया कि शिकायतों पर क्या कार्रवाई हुई।
फ़ैसले के क्या मायने हैं?
सुप्रीम कोर्ट का यह फ़ैसला साफ़ संकेत देता है कि अदालत अब हेट स्पीच के हर मामले में सीधे दख़ल देने के बजाय संस्थाओं को अपनी ज़िम्मेदारी निभाने का मौका देना चाहती है।
पहले सुप्रीम कोर्ट कई मामलों में सक्रिय निगरानी कर रहा था और पुलिस को स्वतः कार्रवाई करने के निर्देश भी दिए गए थे। लेकिन अब अदालत ने कहा है कि हर मामले की निगरानी करना संभव नहीं है।
यही वजह है कि इस फ़ैसले को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ सामने आ रही हैं। कुछ क़ानून विशेषज्ञ इसे न्यायिक सीमाओं का सम्मान मान रहे हैं, जबकि कई लोगों का कहना है कि इससे नफ़रती भाषण देने वालों के मन में क़ानून का डर कम हो सकता है।
चाणक्य नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के कुलपति फ़ैज़ान मुस्तफ़ा ने कहा कि अदालत ने क़ानून में बदलाव का आदेश न देकर संवैधानिक मर्यादा का पालन किया, लेकिन हेट स्पीच जैसी गंभीर समस्या पर और गहराई से विचार की ज़रूरत थी।
वहीं आलोचकों का मानना है कि अगर सुप्रीम कोर्ट पहले की तरह इन मामलों की निगरानी जारी रखता, तो पुलिस और प्रशासन पर कार्रवाई का दबाव बना रहता।
