नई दिल्ली: कुछ कहानियाँ केवल सफलता की नहीं होतीं, बल्कि हिम्मत, संघर्ष और अटूट विश्वास की मिसाल बन जाती हैं। ऐसी ही एक कहानी है उम्मुल खैर की, जिन्होंने बेहद कठिन परिस्थितियों का सामना करते हुए अपने पहले ही प्रयास में UPSC सिविल सेवा परीक्षा पास कर ऑल इंडिया रैंक 420 हासिल की।
उम्मुल खैर जब सिर्फ़ पाँच साल की थीं, तब उनका परिवार दिल्ली आकर हजरत निजामुद्दीन इलाके के पास एक झुग्गी में रहने लगा। उनके पिता कपड़े बेचकर परिवार का गुज़ारा करते थे। बचपन से ही आर्थिक तंगी उनके जीवन का हिस्सा थी, लेकिन सबसे बड़ी चुनौती उनकी गंभीर बीमारी थी।
उम्मुल Brittle Bone Disease से पीड़ित थीं। इस बीमारी के कारण उनकी हड्डियाँ बेहद कमजोर थीं। बड़े होने तक उन्हें 16 बार फ्रैक्चर हुआ और 8 सर्जरी करानी पड़ी। इसके बावजूद भी उन्होंने अपनी पढ़ाई कभी नहीं छोड़ी।
उन्होंने शुरुआती पढ़ाई Pt. Deendayal Upadhyaya Institute for the Physically Handicapped से कक्षा 5 तक की और इसके बाद Amar Jyoti Charitable Trust में पढ़ाई जारी रखी। आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर थी कि कई बार एक वक्त का भोजन भी निश्चित नहीं होता था, लेकिन उन्होंने शिक्षा को ही अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाया।
कक्षा 8 के बाद उन्हें बेहतर सुविधाओं वाले एक स्कूल में छात्रवृत्ति मिली। लेकिन उनके माता-पिता का मानना था कि एक लड़की के लिए इतनी पढ़ाई काफी है। जब उम्मुल ने पढ़ाई छोड़ने से इनकार किया, तो 14 साल की उम्र में परिवार ने उनसे सभी रिश्ते तोड़ दिए।
इसके बाद उन्होंने दिल्ली के त्रिलोकपुरी की एक झुग्गी में अकेले रहना शुरू किया। अपना खर्च चलाने के लिए उन्होंने झुग्गी के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया। धीरे-धीरे उनके पास चार बैच हो गए, जो दोपहर से लेकर रात 11 बजे तक चलते थे। मजदूरों, लोहारों और रिक्शा चालकों के बच्चे उनसे पढ़ते थे और हर छात्र से उन्हें 50 से 100 रुपये तक फीस मिलती थी। इसी कमाई से उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी।
उम्मुल ने कक्षा 10 में अच्छा प्रदर्शन किया और कक्षा 12 में 91 प्रतिशत अंक हासिल किए। इसके बाद उन्हें दिल्ली विश्वविद्यालय के गार्गी कॉलेज में दाखिला मिला। कॉलेज के दौरान उन्होंने डिबेट प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेकर मिलने वाली पुरस्कार राशि से अपनी पढ़ाई का खर्च उठाया। हालांकि शाम के समय वे प्रतियोगिताओं में हिस्सा नहीं ले पाती थीं, क्योंकि उस समय उन्हें बच्चों को पढ़ाना होता था।
साल 2012 में एक मामूली हादसे के बाद उन्हें पूरे एक साल तक व्हीलचेयर पर रहना पड़ा। लेकिन इस दौरान भी उन्होंने पढ़ाई और बच्चों को पढ़ाना नहीं छोड़ा। कॉलेज के बाद उम्मुल ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) से मास्टर्स की पढ़ाई की। इसी दौरान उनका लक्ष्य सिविल सेवा परीक्षा पास करना था। साल 2017 में, 28 वर्ष की उम्र में उन्होंने पहली बार UPSC सिविल सेवा परीक्षा दी और पहले ही प्रयास में ऑल इंडिया रैंक 420 हासिल कर ली।
वर्तमान में उम्मुल खैर भारतीय राजस्व सेवा (IRS) में कस्टम्स विभाग में अधिकारी के रूप में कार्यरत हैं। उम्मुल खैर की कहानी बताती है कि कठिन परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हों, दृढ़ संकल्प और लगातार मेहनत के दम पर उन्हें हराया जा सकता है।
