और आरएसएस ने खुद ही राम मंदिर आंदोलन खत्म कर दिया:

(प्रशांत टंडन)

चंदा और चढ़ावा चोरी की FIR और राम मंदिर ट्रस्ट के कर्ताधर्ता चंपत राय और ट्रस्टी अनिल मिश्र के इस्तीफों के बाद मंदिर के चढ़ावे में 90% की कमी आई है और रोज़ दर्शन करने वालों की संख्या कोई आधी रह गई है.

क्या ये काम कोई और कर सकता था जो आरएसएस ने कर दिया?

राम मंदिर की सबसे बड़ी खासियत है कि ये बाबरी मस्जिद को गिरा कर सुप्रीम कोर्ट के एक बेतुके फैसले से बना. तीस साल से भी ज़्यादा समय तक राम मंदिर आंदोलन ने देश की राजनीति को प्रभावित किया, एक लंबा और हिंसक नफ़रत का दौर चला इस आंदोलन की वजह से. बीजेपी दो सांसद से 1989 के चुनाव में 85 पर पंहुची और फिर लगातार चुनाव जीतने का सिलसिला बना. उत्तर भारत में चुनाव जन मुद्दों की जगह ध्रुवीकरण पर होने लगे.

विपक्षी पार्टियों को लंबे समय तक समझ में ही नहीं आया कि राम मंदिर के घोड़े पर सवार बीजेपी को रोके कैसे. उत्तर प्रदेश और बिहार से कांग्रेस का सफ़ाया ही हो गया. विपक्षी नेता ही अपने आपको बीजेपी से बड़ा हिंदू साबित करने की होड़ में लग गये. अंततः राहुल गांधी संविधान और सामाजिक न्याय के ज़रिये इस नफ़रत की राजनीति की काट निकालने में सफल हुए.

लेकिन साम्प्रदायिकता की राजनीति की चुनौती अभी भी बरकरार है, हालांकि नई पीढ़ी इसे रिजेक्ट कर रही है. राम मंदिर में हुई प्रतिष्ठा में मोदी और मोहन भागवत सेंटरस्टेज पर थे, शंकराचार्यों ने बहिष्कार किया, साधू संतों की उपेक्षा हुई. तब साफ़ हो गया था कि ये आस्था का केंद्र न होकर पैसा उगाही और रियल इस्टेट के धंधे का जरिया बनेगा. वैसा हुआ भी. राम मंदिर एक इंडस्ट्री बन गया.

गुजराती व्यापारी वहां पहुंच गये, बड़े पैमाने पर जमीनों की खरीदफरोख्त हुई, सस्ती ज़मीन खरीद महंगी बेचने का धंधा शुरू हुआ. वो सब वहाँ हुआ जिसका आस्था या आध्यात्म से कोई सरोकार नहीं है. आरएसएस में नैतिक बल की हमेशा से कमी रही है. वो अयोध्या में भी दिखी. राम मंदिर में वही हुआ जिस वजह से इसे बनाया गया था.

इस पूरे प्रकरण में तीन दशक का एक राजनीतिक आंदोलन खत्म हो चुका है, अब राजनीति वापिस असल मुद्दों पर लौटेगी. बीजेपी चाहे भी इस डैमेज को रिपेयर नहीं कर सकती.

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