ग़ाज़ा में हालात दिन-ब-दिन भयावह होते जा रहे हैं। युद्ध और नाकेबंदी के चलते वहां की 23 लाख की आबादी आज गंभीर मानवीय संकट से जूझ रही है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार, ग़ाज़ा में 5 लाख से अधिक लोग भुखमरी की कगार पर हैं, जिनमें लगभग 1.1 लाख बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। सबसे ज़्यादा प्रभावित वो नवजात और शिशु हैं जिन्हें न तो मां का दूध मिल पा रहा है और न ही कोई पोषक विकल्प।
स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार, कई महिलाएं भूख के चलते अपना दूध खो चुकी हैं। मारी गई माताओं के बच्चों को अब बुज़ुर्ग दादियां काबुली चना पीसकर घोल बनाकर पिला रही हैं। लेकिन यह पोषण की दृष्टि से बेहद असुरक्षित है। कई इलाकों में जानवरों का चारा बच्चों को खिलाया जा रहा है, और कुछ परिवार रेत मिलाकर रोटियां बना रहे हैं। ये असाधारण हालात अब मासूमों की ज़िंदगी पर सीधा ख़तरा बन चुके हैं।
WHO की एक आपात ब्रीफिंग में बताया गया कि ग़ाज़ा में 60% स्वास्थ्य सुविधाएं पूरी तरह से बंद हैं और 80% से अधिक बच्चों को नियमित टीकाकरण नहीं मिल पा रहा है। यूनिसेफ ने चेताया है कि यदि तत्काल मानवीय सहायता नहीं पहुंचाई गई, तो आने वाले दिनों में बच्चों की मृत्यु दर और तेज़ी से बढ़ सकती है।
यह सिर्फ़ युद्ध की नहीं, इंसानियत की भी हार है। पूरी दुनिया के सामने ग़ाज़ा के बच्चे आज मदद की सबसे आख़िरी पुकार कर रहे हैं।
ग़ाज़ा में भूख का नरसंहार: 1.1 लाख बच्चे कुपोषण के शिकार, रेत और चारे पर ज़िंदगी की जंग
