ग़ाज़ा: बमबारी के बीच, विकलांग लड़की ने जान बचाकर भागते परिवार से कहा, ‘मुझे यहीं छोड़ दो’

युद्धग्रस्त ग़ाज़ा में हज़ारों फ़लस्तीनी, इसराइली हमलों, गोलाबारी और खाद्य सामग्री की क़िल्लत के बीच जीवन गुज़ारने के लिए मजबूर हैं, और इन विकट हालात का विकलांगजन पर गहरा असर हुआ है, जो अक्सर अपनी जान बचाने और समय पर सुरक्षित स्थान पर पहुँच पाने में असमर्थ हैं. उन्हें इन परिस्थितियों में विशाल चुनौतियों से जूझना पड़ रहा है, जिसका उल्लेख बुधवार को प्रस्तुत की गई एक नई रिपोर्ट में किया गया है.

विकलांगजन के अधिकारों पर समिति (CRPD) के अधिकारियों ने क़ाबिज़ फ़लस्तीनी इलाक़े में ज़मीनी स्थिति पर जानकारी जुटा कर यह रिपोर्ट तैयार की है, जिसे जिनीवा में पेश किया गया.

इसमें सेरेब्रल पाल्सी से पीड़ित और व्हीलचेयर पर निर्भर एक 14 वर्षीय बच्ची का उल्लेख है, जो ग़ाज़ा में इसराइली सैन्य कार्रवाई के दौरान अपनी जान बचाने की कोशिश कर रही भीड़ का हिस्सा थी. मगर, आपाधापी में उसकी व्हीलचेयर खो गई.

CRPD समिति के सदस्य मुहन्नद सलाह अल-अज्ज़ेह ने बताया कि वह विकलांग लड़की, रेत पर रेंगने के लिए मजबूर थी. उसे महसूस हुआ कि उसके परिजन को उसकी वजह से धीरे चलना पड़ रहा है और इसलिए उस लड़की ने उन्हें कहा कि वे उसे वहीं छोड़ कर चले जाएं.

इसराइल पर हमास के नेतृत्व में अक्टूबर 2023 में किए गए हमलों के बाद इसराइल ने सैन्य कार्रवाई शुरू की और बार-बार लोगों को अपने घर, जगह छोड़ कर जाने के लिए आदेश दिए हैं.

लेकिन कुछ विकलांग लोग को इन आदेशों का पता नहीं चल पाता है. समिति के अनुसार यह एक गम्भीर मुद्दा है, और आपात परिस्थितियों में विकलांगजन के लिए स्थिति जटिल हो जाती है.

अधिकारों की रक्षा में विफलता

यूएन समिति ने ग़ाज़ा और पश्चिमी तट में व्यक्तियों, प्रतिनिधिमंडलों, और संगठनों से विशेष बातचीत के आधार पर यह रिपोर्ट तैयार की है, जिसमें सिलसिलेवार ढंग से अनुशंसाएँ पेश की गई हैं. साथ ही, इसराइल और फ़लस्तीनी प्राधिकरण को अपनी चिन्ताओं से अवगत कराया गया है.

CRPD सदस्य मुहन्नद सलाह अल-अज्ज़ेह ने कहा कि ग़ाज़ा में हालात एक बड़ी चिन्ता का विषय है.

उन्होंने कहा कि समिति का मानना है कि विकलांग जन के अधिकार पर कन्वेंशन में शामिल सभी सदस्य देश, किसी न किसी रूप में, आपात हालात के दौरान विकलांग व्यक्तियों के न्यूनतम रक्षा सुनिश्चित करने, अपने दायित्वों को निभा पाने में विफल साबित हुए हैं.

समिति ने एक घटना का वर्णन किया, जब रफ़ाह में बार-बार बिजली आपूर्ति ठप हो जाने से एक माँ को अपने मोबाइल पर जगह खाली करके जाने का आदेश नहीं मिला, जिसके बाद उस महिला व उनके बच्चों की एक इसराइली हमले में मौत हो गई.

नौ-वर्षीय नूर के अभिभावक सुन नहीं सकते हैं, और इसराइली टैंक, गोलाबारी व हमलों से जान बचाने के लिए वे अपनी बेटी पर ही निर्भर हैं.

नूर को युद्ध की भाषा समझाने के लिए नए शब्दों को सीखना पड़ा, जैसेकि टैंक, विमान और अन्य हथियार ताकि अपने माता-पिता को इन ख़तरों की जानकारी दे सके.

अब्दुलरहमान अल-घरबावी जैसे अनेक उदाहरण हैं, जो सेरेब्रल पाल्सी से पीड़ित हैं. 27 वर्षीय इस ग्राफ़िक डिज़ाइनर को क़रीब 9 बार घर से जबरन विस्थापित होना पड़ा और हर बार माँ ने उनकी व्हीलचेयर की देखभाल की जबकि पिता व भाई ने उन्हें उठाया.

ग़ाज़ा सिटी में भयावह हालात

यूएन मानवतावादी कार्यालय (OCHA) ने बुधवार को ग़ाज़ा सिटी में बिगड़ते हालात और इसराइली हमलों में आई तेज़ी के प्रति चेतावनी जारी की है. यहाँ अकाल व्याप्त है और आम फ़लस्तीनी बुरी तरह हताश व थके हुए हैं और बदतर होते संकट के गर्त में धँसते जा रहे हैं.

यूएन एजेंसी के साझेदार संगठनों ने चेतावनी दी है कि ग़ाज़ा सिटी में टकराव में तेज़ी आने का विस्थापन शिविरों पर रह रही फ़लस्तीनी पर भयावह असर हो रहा है, जिनमें से बहुत से लोग उत्तरी ग़ाज़ा से विस्थापित हुए थे. 

OCHA ने कहा कि अनेक घर-परिवार, असुरक्षा और ऊँची क़ीमत की वजह से अन्य स्थान का रुख़ करने में असमर्थ हैं. इन हालात में वृद्धजन और विकलांग व्यक्ति विशेष रूप से प्रभावित हुए हैं.

साझेदार संगठनों के अनुसार, 14-31 अगस्त के दौरान, 82 हज़ार लोग विस्थापन का शिकार हुए हैं, जिनमें 30 हज़ार से अधिक उत्तरी ग़ाज़ा से दक्षिणी इलाक़े की ओर गए हैं.

सहायता सामग्री की कमी बरक़रार

इस बीच, ज़रूरतमन्दों तक मानवीय सहायता पहुँचाने में अवरोधों का सामना करना पड़ रहा है. टुकड़ों में राहत सामग्री पहुँची है, लेकिन पर्याप्त स्तर पर नहीं.

पिछले पाँच महीनों में पहली बार, मवेशियों के लिए चारा पहुँचाया गया है. डेयर अल बलाह में मवेशी पालने वाले परिवारों को 60 मीट्रिक टन चारा वितरित किया गया है.

हालांकि, खाना पकाने के लिए ईंधन पिछले पाँच महीनों से यहाँ नहीं पहुँचा है, जबकि इसकी लगातार मांग की गई है. यह स्थानीय बाज़ारों में भी उपलब्ध नहीं है.

OCHA के अनुसार, ईंधन के लिए जलाने की लकड़ी अब लोगों की पहुँच से बाहर होती जा रही है. बहुत से कचरे, फेंक दी गई लकड़ी को खाना पकाने के लिए वैकल्पिक स्रोत के रूप में इस्तेमाल में ला रहे हैं, लेकिन उसके स्वास्थ्य व पर्यावरण के लिए जोखिम हैं.

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