भारतीय मूल के वैज्ञानिक डॉ. गुरतेज संधू आज दुनिया के सबसे नवाचारी टेक्नोलॉजी एक्सपर्ट्स में गिने जाते हैं। उनके नाम लगभग 1380 अमेरिकी पेटेंट दर्ज हैं | यानी वे उन चुनिंदा वैज्ञानिकों में हैं जिन्होंने अपनी खोजों से टेक्नोलॉजी की दिशा ही बदल दी।
डॉ. संधू माइक्रॉन टेक्नोलॉजी नाम की कंपनी में प्रिंसिपल फ़ेलो और कॉर्पोरेट वाइस प्रेसिडेंट हैं। यही कंपनी वह मेमोरी चिप बनाती है, जिसमें आपके स्मार्टफ़ोन की हज़ारों तस्वीरें और वीडियो सुरक्षित रहते हैं।
बचपन से थी विज्ञान में दिलचस्पी
गुरतेज संधू का जन्म लंदन में हुआ, लेकिन बचपन अमृतसर, पटियाला और चंडीगढ़ में बीता। उनके पिता डॉ. सरजीत संधू केमिस्ट्री में पीएचडी थे और मां ने मास्टर्स किया था। गुरतेज बचपन से ही विज्ञान और इंजीनियरिंग में रुचि रखते थे। वे बताते हैं, “मैं हमेशा सवाल पूछता था – तारे क्या हैं, लोग क्यों मरते हैं। यही जिज्ञासा मुझे विज्ञान की ओर ले गई।” उन्होंने आईआईटी दिल्ली से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में पढ़ाई की और फिर नॉर्थ कैरोलाइना यूनिवर्सिटी, चैपल हिल (अमेरिका) से पीएचडी की।
मेमोरी चिप्स को बनाया और भी स्मार्ट
डॉ. संधू बताते हैं, “जब मैंने 25 साल पहले काम शुरू किया था, उस समय चिप्स बहुत महंगी और कमज़ोर थीं। आज वही चिप्स सस्ती और बेहद ताक़तवर हैं।” उन्होंने मेमोरी चिप्स को छोटा, तेज़ और ज़्यादा डेटा स्टोर करने लायक बनाया | यानी आज आपके फ़ोन में जो चिप लगी है, उसमें उनका बड़ा योगदान है।
मिले कई बड़े सम्मान
डॉ. संधू को साल 2018 में आईईईई एंड्रयू एस. ग्रोव अवॉर्ड मिला। हाल ही में उन्हें पंजाब यूनिवर्सिटी का ‘विज्ञान रत्न पुरस्कार’ भी दिया गया, जो भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने प्रदान किया।
इसके अलावा एआई यानी आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस पर डॉ. संधू का कहना है, “जब इंटरनेट आया था, लोग डरते थे। अब सबकुछ इंटरनेट पर ही होता है। एआई भी ऐसा ही है – यह हमारी नकल करता है। फर्क बस इतना है कि हम इसका इस्तेमाल कैसे करते हैं।”
बच्चों को दी सलाह
डॉ. संधू कहते हैं, “जो विषय सबसे मुश्किल लगे, उसी पर ज़्यादा मेहनत करो। मेहनत का कोई विकल्प नहीं होता। कभी-कभी समाधान तुरंत नहीं मिलता, लेकिन कोशिश जारी रखो, एक दिन रास्ता मिल ही जाता है।”
पंजाब से हमेशा जुड़ा रिश्ता
अपने राज्य पंजाब के बारे में वे कहते हैं, “पंजाब पीछे नहीं है, पंजाबी हर जगह आगे हैं। बस ज़रूरत है कि शिक्षा पर ज़्यादा ध्यान दिया जाए और बच्चों को प्रोत्साहन मिले।”
निष्कर्ष: डॉ. गुरतेज संधू आज इस बात का उदाहरण हैं कि अगर जिज्ञासा, मेहनत और सीखने की ललक बनी रहे, तो कोई भी इंसान दुनिया बदल सकता है। उन्होंने न सिर्फ तकनीक को नई ऊँचाई दी, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी यह सिखाया कि “सोचने की प्रेरणा पेटेंट से नहीं, दिल से आती है।”
