मंगोलो ने कभी हार का मुंह नही देखा आख़िर वो हिन्दुस्तान की ज़मीन पर बुरी तरह पिट गए

दिल्ली में मौजूद ये मकबरा सुल्तान गयासुद्दीन तुग़लक़ का है और बड़े मकबरे के दायीं तरफ दिख रहा छोटा मकबरा ज़फर खान का है। मंगोलों को बुरी तरह से हराने वाले ज़फ़र ख़ान दुनिया के उन अज़ीम सिपाहसालारो मे शामिल हैं जो हमेशा ग़ाज़ी रहे और कभी भी कोई जंग नहीं हारे, आख़िर में मैदान-ए-जंग में लड़ते हुए शहीद भी हो गए..

जिन मंगोलो ने हार का मुंह नही देखा आख़िर मे वो हिन्दुस्तान की ज़मीन पर बुरी तरह पिट गए… और मंगोलो को हराने का शर्फ़ जाता है हिन्दुस्तान की तारीख़ के सबसे ताक़तवर बादशाहों में से एक अलाउद्दीन ख़िलजी को और उनके सबसे ख़ास सिपाहसालार मलिक हिज़बरुद्दीन युसुफ़ जो ख़ुद को ज़फ़र ख़ान कहते थे.

ज़फ़र ख़ान दुनिया के ऐसे चंद सिपाहसालारों (कमांडर) में भी शामिल थे जिन्होंने मंगोल आक्रमणों को ना सिर्फ़ नाकाम कर अपने रियासत और अवाम की हिफ़ाज़त (रक्षा) की बल्के अजीवन अजय रहे, उन्होने कभी हार का मुंह नही देखा…

उन्होंने न सिर्फ़ बड़ी मंगोल सेनाओं को हराया बल्कि मध्य एशिया में मंगोलों के ख़िलाफ़ अभियान भी चलाया. ताक़तवर मंगोल सेना को उन्होंने एक नहीं कई बार हराया.

जालंधर मे 1297 को हुई मंगोलो से पहली जंग मे ज़फ़र ख़ान ने ना सिर्फ़ उन्हे हराया बल्के बीस हज़ार से अधिक मगोंल सिपाहीयों को मार डाला और बाक़ी को पकड़ देल्ही मे अलाउद्दीन ख़िलजी के पास भेज दिया जिनमे से अधिकतर के सर को धड़े से अलग कर दिया गए या जिनकी तादाद तीन हज़ार से अधिक थी और इनके सर को देल्ही मे दफ़ना दिया गया और फिर बाद मे उस जगह पर अलाउद्दीन ख़िलजी ने एक क़िला तामीर करवाया जिसे “सीरी क़िला” के नाम से जाना गया और ये नाम ‘सर’ से ही आया है..

1298 मे ज़फ़र ख़ान का मंगोल फ़ौज से मुक़ाबला सिंध मे हुआ जहां मंगोलो ने कई जगह पर क़ब्ज़ा रखा था और इस जंग मे एक बार फिर मंगोलो को हार सामना करना पड़ा और दो हजार से अधिक सिपाहीयों के साथ उनके जनरलों को क़ब्ज़े में ले लिया गया.

अगले साल 1299 को मंगोलो ने पिछले दो हार का बदला लेने की नियत से देल्ही सलतनत के दारुलहुकुमत पर ही हमला करने की नियत से कूच किया..

अलाउद्दीन ख़िलजी ने अपने वज़ीरों से मशवरा किया सबने समझौते करने की ही बात की पर अलाउद्दीन ने इन सबकी बात काटते हुए कहा :- ” के अगर मै तुम्हारी बात को मान लेता हुं तो कल किसी को मुंह दिखामे के लाएक़ नही रहुंगा, मुझे मैदान ए जंग मे जाना ही होगा “… इसके बाद अलाउद्दीन ख़िलजी ने इस जंग की कमान एक बार फिर से ज़फ़र ख़ान को सौंप दी और मंगोलो को फिर से हार का सामना करना पड़ा … पर इस जंग मे दुश्मनों का छक्का छुड़ाते छुड़ाते ज़फ़र ख़ान ख़ुद शहीद हो गए…

बुरी तरह हार का सामना कर रहे मंगोलो मे ज़फ़र ख़ान के नाम का ख़ौफ़ इस तरह तारी हो गया था के जब भी उनका घोड़ा पानी नही पीता था तो उन्हे लगता था शायद इसने “ज़फ़र” को देख लिया हो और वो जिन्दा हो..

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