नई दिल्ली। जामिया मिल्लिया इस्लामिया (केन्द्रीय विश्वविद्यालय), नई दिल्ली के हिंदी विभाग एवं मालवीय मिशन शिक्षक प्रशिक्षण केंद्र (MMTTC) के संयुक्त तत्वावधान में छह दिवसीय ऑनलाइन लघु अवधि कार्यक्रम “रीतिकाव्यः अध्ययन की चुनौतियाँ” विषय पर आयोजित हुआ। 12 मार्च से 18 मार्च 2026 तक चले इस बौद्धिक उन्नयन के कार्यक्रम में रीतिकालीन साहित्य के पारंपरिक ढांचों से इतर नवीन शोध दृष्टियों और समकालीन चुनौतियों पर गंभीर मंथन किया गया। कार्यक्रम में भारत के विभिन्न भागों सहित विदेशों से भी विशेषज्ञ विद्वानों की सहभागिता रही। पूरे आयोजन में देश-विदेश के 22 मूर्धन्य विद्वानों ने अपने व्याख्यान प्रस्तुत किए, जिससे देश के कई राज्यों से प्रतिभागिता करने वाले 50 उच्च शिक्षा शिक्षक लाभान्वित हुए।

उद्घाटन सत्रः विषय की महत्ता और प्रासंगिकता-
कार्यक्रम के वैचारिक धरातल को निर्मित करते हुए एमएमटीटीसी की समन्वयक प्रो. कुलविंदर कौर, पाठ्यक्रम संयोजक प्रो. हेमलता महीश्वर एवं विभागाध्यक्ष प्रो. नीरज कुमार ने अपने बीज वक्तव्यों में रीतिकाव्य की ऐतिहासिक प्रासंगिकता और वर्तमान समय में इसकी उपयोगिता एवं महत्व पर प्रकाश डाला। वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि रीतिकाव्य केवल दरबारी श्रृंगार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें लोक-जीवन, संस्कृति और शिल्प की जो बारीकियाँ हैं, उन्हें आज के संदर्भ में पुनः परिभाषित करने की आवश्यकता है। इस अवसर पर कुलपति प्रो. मजहर आसिफ एवं कुलसचिव प्रो. महताब आलम रिजवी सहित विश्ववविद्यालय प्रशासन के प्रति धन्यवाद एवं आभार व्यक्त किया गया। बौद्धिक विमर्श का क्रमबद्ध प्रवाह-
छह दिनों के इस वृहद् ज्ञान-सत्र में प्रतिदिन प्रातः 9:30 से सायं 4:30 तक विशेषज्ञ विद्वानों के व्याख्यान एवं प्रतिभागियों के साथ प्रश्नोत्तर के रूप में सार्थक संवाद चलता रहा। पूरे कार्यक्रम को अपने कुशल सञ्चालन से पाठ्यक्रम संयोजक प्रो. हेमलता महीश्वर एवं हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो. नीरज कुमार ने रुचिकर एवं प्रभावोत्पादक बनाए रखा

प्रथम दिवस प्रथम सत्र में डॉ. रोहमा ने रीतिकाल के सामाजिक ताने-बाने को बुना और द्वितीय सत्र में प्रो. वागीश शुक्ल ने लक्षण ग्रंथों की शास्त्रीयता पर प्रकाश डाला। तृतीय सत्र में प्रो. जगदीश्वर चतुर्वेदी ने ब्रजभाषा के सौंदर्य और चतुर्थ सत्र में प्रो. बजरंग बिहारी तिवारी ने रीतिकाव्य के लोकपक्ष पर प्रकाश डाला।
द्वितीय दिवस प्रो. आशीष त्रिपाठी ने रीतिकालीन निर्गुण भक्ति काव्यधारा पर केन्द्रित बातें करते हुए साहित्येतिहास लेखन की विसंगतियों पर भी विचार रखे, जबकि प्रो. वीरपाल सिंह और प्रो. शंभूनाथ तिवारी ने कला पक्ष एवं रीतिसिद्ध काव्य के वैशिष्ट्य को रेखांकित किया। प्रो. जगदेव ने कवि ठाकुर के विशेष सन्दर्भ में रीतिकाव्य में निहित लोक तत्व को उजागर किया जो अक्सर दरबारों की चकाचौंध में ओझल हो जाता है।
तृतीय दिवस रीतिकाव्य के वैश्विक प्रभाव उजागर हुए। अमेरिका से जुड़े डॉ. दलपत राजपुरोहित ने रीतिकालीन भक्ति एवं चरित्र काव्य की सूक्ष्मताओं को साझा किया। तत्पश्चात प्रो. सुधीश पचौरी ने रीतिकाव्य में यौनिकता के जटिल प्रश्नों को छुआ। डॉ. लक्ष्मण प्रसाद गुप्ता ने रीतिमुक्त काव्य के वितान को स्पष्ट किया और प्रो. सदानंद शाही ने पलटूदास के माध्यम से सामाजिक चेतना पर बात की।
चतुर्थ दिवस ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के प्रो. इमरै बंधा ने घनानंद के काव्य में निहित विरह और प्रेम की पराकाष्ठा पर वृहद व्याख्यान देते हुए रीतिमुक्त काव्य धारा की महत्ता निरुपित की। प्रो. आशुतोष ने रीतिकालीन सौन्दर्य दृष्टि पर गहन बातचीत की तो प्रो. अनामिका ने रीतिकाल में स्त्री की छवि और अस्मिता पर एक नई दृष्टि प्रस्तुत की। इसी क्रम में प्रो. वेद प्रकाश ने रीतिकाल में अनुभाव विधान पर अपने विद्वत्तापूर्ण विचार रखे।

पंचम दिवस का आरंभ इतिहासकार प्रो. संध्या शर्मा के व्याख्यान से हुआ जिसमे उन्होंने रीतिकाल के धार्मिक परिदृश्य पर विस्तार से प्रकाश डाला। अगले वक्ता के रूप में प्रो. माधव हाड़ा ने रीतिकाव्य में भक्ति व श्रृंगार के द्वंद्व विषय पर प्रतिभागियों का ज्ञान संवर्धन किया और तत्कालीन सांस्कृतिक परिदृश्य के अंतर्संबंधों को स्पष्ट किया। यह दिन प्रतिभागियों के लिए भी विशेष रहा, जहाँ छह समूहों में वर्गीकृत होकर उन्होंने ‘पीपीटी’ के माध्यम से निगुण भक्ति, श्रृंगार, नीति, सामाजिक परिदृश्य, लोक, सौन्दर्य दृष्टि और काव्य भाषा जैसे विषयों पर अपनी मौलिक शोध प्रस्तुतियाँ दीं, जो उनकी विषयगत समझ का प्रमाण बनीं। इस दौरान प्रो. दिलीप शाक्य और प्रो. मुकेश कुमार मिरोठा की समीक्षक के रूप में गरिमामयी भूमिका रही।
अंतिम छठे दिन प्रो. संतोष भदौरिया ने रीतिकाव्य के भूगोल और इसकी व्याप्ति पर सविस्तार ज्ञानवर्धक चर्चा की। तदुपरांत ऑनलाइन परीक्षा के माध्यम से प्रतिभागियों के ज्ञान का मूल्यांकन किया गया। तत्पश्चात डॉ. विजय बहादुर सिंह ने रीतिकालीन काव्य के भाव विन्यास और शिल्प पक्ष का ऐतिहासिक विवेचन किया। अगले सत्र में प्रो. पी. सी. टंडन ने रीतिकालीन काव्य की बहुआयामी समृद्धि को प्रभावशाली ढंग से रेखांकित किया। अंतिम सत्र में प्रो. रोहिणी अग्रवाल की अनुपस्थिति में कोर्स समन्वयक प्रो. हेमलता महीश्वर ने कमान संभालते हुए अत्यंत ओजस्वी व्याख्यान दिया। उन्होंने रीतिकालीन महिला साहित्यकारों की उपेक्षा पर प्रश्न उठाते हुए उन्हें साहित्य की मुख्य धारा में उचित स्थान देने की पुरजोर आवाज उठायी। उन्होंने समाज और साहित्य में स्त्री की स्थिति पर जो विचार रखे, वह प्रतिभागियों के लिए चिंतन का नया केंद्र बना।
Source : Jamia Millia Islamia, New Delhi
