आज इंटरनेशनल नौरोज डे है नौरोज़ एक पारसी फेस्टिवल है इसे फारसी नया साल भी कहा जाता इसे ईरान में बड़े पैमाने मनाया जाता है हिंदुस्तान में इस फेस्टिवल को मानाने का जिक्र सबसे पहले सुल्तान बलबन के दौर में मिलता है, उसके बाद से ही कभी छोटे तो कभी बड़े पैमाने पर हिन्दोस्तान के हुक्मरानों ने इस फेस्टिवल को सेलिब्रेट किया, जब हिन्दोस्तान में मुगलों की हुकूमत का आगाज़ हुआ तो इस त्योहार की सेलिब्रेशन का पैमाना अपने उरूज़ पर पहुंच गया मसलन अबुल फजल की किताब अकबरनामा और बादशाह जहाँगीर की तुज्क- ए-जहाँगीरी में इस फेस्टिवल को बड़े पैमाने पर मनाये जाने की जानकारी मिलती है।
लेकिन जब मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब आलमगीर के दौर का आगाज़ हुआ उन्होंने बादशाहत के आठवें साल में बहुत से मजहबी त्योहारों को बड़े पैमाने पर मनाए जाने पर लगाम लगाई। इस पाबंदी से लगभग सभी मज़हबों के लोगों पर असर पड़ा। नौरूज़ पर होने वाले ज़बर्दस्त जश्न और ईद-उल-फ़ितर और ईद-उल-अज़हा जैसे मुस्लिम त्योहारों को भी बड़े पैमाने पर शान-ओ-शौक़त से मनाने पर रोक लग गयी।”
औरंगज़ेब ने ये फरमान कुछ हद तक इसलिए जारी किए थे, क्योंकि उन्हें लगा कि त्योहारों पर होने वाली धूमधाम का पैमाना नागवार हो रहा था। इस के अलावा इन फ़रमानों को जारी करने के पीछे आवाम की हिफ़ाज़त का ख़्याल भी छिपा हुआ था।
उम्रदराज़ होने पर बेटे मुअज्ज़म को लिखे एक ख़त में “औरंगजेब ने उन्हें नौरूज़ में शामिल होने के लिए लानत भी भेजी थी।”
Source : History Hour’s
