Supreme Court of India ने एक अहम फैसले में साफ कर दिया है कि अगर कोई व्यक्ति हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म छोड़कर किसी दूसरे धर्म जैसे ईसाई धर्म को अपनाता है, तो उसे अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा नहीं मिल सकता। अदालत ने Andhra Pradesh High Court के फैसले को सही ठहराते हुए इस बात पर मुहर लगा दी।
जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की बेंच ने कहा कि Constitution (Scheduled Castes) Order, 1950 के मुताबिक SC का दर्जा सिर्फ उन्हीं लोगों को मिल सकता है, जो हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म को मानते हैं। इस नियम में कोई ढील या अपवाद नहीं है।
कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि जो व्यक्ति इन धर्मों के अलावा किसी और धर्म का पालन करता है, वह SC से जुड़े किसी भी लाभ जैसे आरक्षण, कानूनी सुरक्षा या अन्य अधिकार का दावा नहीं कर सकता। यानी, धर्म बदलने के साथ ही SC से मिलने वाले अधिकार खत्म हो जाते हैं।
यह मामला एक ऐसे व्यक्ति से जुड़ा था, जिसने ईसाई धर्म अपना लिया था और पिछले कई सालों से पादरी के रूप में काम कर रहा था। उसने Scheduled Castes and Scheduled Tribes (Prevention of Atrocities) Act, 1989 के तहत शिकायत दर्ज कराई थी, जिसमें मारपीट, जातिसूचक गालियां और धमकी देने के आरोप लगाए गए थे।
आरोपियों ने कोर्ट में कहा कि जब शिकायतकर्ता अब ईसाई बन चुका है, तो वह SC श्रेणी में नहीं आता, इसलिए उसे इस कानून का लाभ नहीं मिल सकता।
इससे पहले अप्रैल 2025 में हाई कोर्ट ने भी यही कहा था कि ईसाई धर्म में जाति व्यवस्था नहीं होती, इसलिए इस धर्म को मानने वाला व्यक्ति SC/ST एक्ट के तहत संरक्षण नहीं ले सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी गौर किया कि शिकायतकर्ता ने न तो अपने पुराने धर्म में वापसी की थी और न ही अपनी जाति में दोबारा शामिल हुआ था। इसके उलट, वह लगातार ईसाई धर्म का पालन कर रहा था और पादरी के रूप में सक्रिय था।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल जाति प्रमाण पत्र होना काफी नहीं है। धर्म परिवर्तन के बाद SC का अधिकार अपने आप खत्म हो जाता है, भले ही प्रमाण पत्र रद्द हुआ हो या नहीं। हालांकि, ऐसे प्रमाण पत्र को रद्द करने की प्रक्रिया अलग से कानून के तहत होती है।
