गाज़ा पट्टी से सामने आया एक वीडियो आज सिर्फ़ एक दृश्य नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के ज़मीर पर सवाल है। जब इमारतें मलबे में तब्दील कर दी गईं, स्कूलों को खामोश कर दिया गया और विश्वविद्यालयों को निशाना बनाया गया तब भी गाज़ा के छात्र समुद्र किनारे बैठकर परीक्षा दे रहे हैं।
सोचिए, जहां दुनिया के कई हिस्सों में एग्ज़ाम हॉल की सुविधा भी “ज़रूरी” मानी जाती है, वहीं गाज़ा के छात्र खुले आसमान के नीचे, तबाही के बीच अपने भविष्य के लिए लड़ रहे हैं। ये सिर्फ़ पढ़ाई नहीं, यह एक खामोश बग़ावत है! उन हालात के खिलाफ जो उनसे उनका हक़ छीनने पर तुले हैं।
सोशल मीडिया पर वायरल इस वीडियो ने लोगों को झकझोर कर रख दिया है। एक यूज़र ने लिखा, “जिन्होंने स्कूल गिराए, उन्होंने शायद यह नहीं सोचा था कि ये बच्चे अपने सपनों को गिरने नहीं देंगे।” और सच भी यही है—इमारतें तोड़ी जा सकती हैं, लेकिन इरादों को नहीं।
मीडिया रिपोर्टस के मुताबिक़, गाज़ा में अब तक 204 शैक्षणिक संस्थान पूरी तरह तबाह हो चुके हैं, जिनमें 190 स्कूल और 14 विश्वविद्यालय शामिल हैं। 305 अन्य संस्थान आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हैं। इसका सीधा असर लाखों छात्रों पर पड़ा है, जो अपने बुनियादी शिक्षा के अधिकार से वंचित हो गए हैं।
और आंकड़े यहीं नहीं रुकते—12,800 से अधिक छात्रों की जान जा चुकी है, जबकि 760 शिक्षक और शिक्षा से जुड़े लोग भी इस तबाही का शिकार बने हैं। 7,85,000 से ज्यादा छात्र अपनी पढ़ाई जारी नहीं रख पा रहे।
यह सिर्फ़ एक “संकट” नहीं है, यह पूरी पीढ़ी के भविष्य पर हमला है। दुनिया खामोश है, लेकिन गाज़ा के ये छात्र खामोश नहीं हैं। वे हर लहर के साथ यह ऐलान कर रहे हैं कि— “हम किताबें फिर उठाएंगे, चाहे ज़मीन पर जगह बचे या नहीं।”
यह दृश्य हमें मजबूर करता है पूछने पर— क्या शिक्षा का हक़ भी अब जंग का शिकार हो चुका है? गाज़ा के छात्रों का यह जज़्बा सिर्फ़ सराहना नहीं, बल्कि समर्थन और आवाज़ उठाने की मांग करता है।
