धर्मांतरण कानून’ पर हाईकोर्ट की सख्ती: फर्जी मामलों के बढ़ते चलन पर उठे गंभीर सवाल

नई दिल्ली: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के धर्मांतरण विरोधी कानून को लेकर एक बेहद अहम और सख्त टिप्पणी की है। अदालत ने साफ कहा है कि इस कानून के तहत ‘झूठी, फर्जी और निराधार एफआईआर’ दर्ज करने का चलन तेजी से बढ़ रहा है, जो न्याय व्यवस्था के लिए चिंता का विषय है।

मीडिया रिपोर्टस के अनुसार, जस्टिस अब्दुल मोइन और जस्टिस प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ एक ऐसे मामले की सुनवाई कर रही थी, जिसमें एक मुस्लिम युवक पर धर्म परिवर्तन और जबरन शादी का आरोप लगाया गया था।

लेकिन जैसे-जैसे सच्चाई सामने आई, कहानी पूरी तरह बदल गई।

युवती ने अपने बयान में साफ कहा कि वह पिछले तीन सालों से युवक के साथ अपनी मर्जी से रिश्ते में थी। न तो उस पर धर्म बदलने का कोई दबाव था और न ही शादी के लिए कोई मजबूरी। उसने सभी आरोपों को सीधे-सीधे खारिज कर दिया और यह भी कहा कि वह अपनी इच्छा से उसी के साथ रहना चाहती है।

यहीं से अदालत का रुख सख्त हो गया।

कोर्ट ने सवाल उठाया कि जब खुद कथित पीड़िता ने ही सभी आरोपों को झूठा बता दिया, तो फिर पुलिस क्यों इस मामले को आगे बढ़ा रही है? अदालत ने जांच अधिकारी के रवैये को “अजीब” बताया, क्योंकि उसने सिर्फ रेप का आरोप हटाया, लेकिन बाकी गंभीर धाराओं में जांच जारी रखी।

अदालत ने दो टूक कहा— जब सच्चाई साफ हो चुकी है, तो जांच जारी रखने का कोई मतलब नहीं बनता।

इतना ही नहीं, कोर्ट ने एक बड़े पैटर्न की ओर भी इशारा किया। उसने कहा कि इस कानून के तहत तीसरे पक्ष द्वारा एफआईआर दर्ज कराने के मामलों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है, जो दुरुपयोग की ओर संकेत करता है। इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के एक हालिया फैसले का भी जिक्र किया गया, जहां इसी तरह की प्रवृत्ति सामने आई थी।

मामले की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने शिकायतकर्ता यानी युवती के पिता को खुद कोर्ट में पेश होने का आदेश दिया है, ताकि यह तय किया जा सके कि उनके खिलाफ झूठी शिकायत दर्ज कराने पर कार्रवाई क्यों न की जाए।

साथ ही, राज्य सरकार को भी कठघरे में खड़ा करते हुए अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) से 19 मई तक हलफनामा मांगा गया है, जिसमें ऐसे मामलों पर की गई कार्रवाई का पूरा ब्योरा देना होगा।

फिलहाल, अदालत ने आरोपी युवक और युवती दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं और गिरफ्तारी पर रोक लगा दी है।

निष्कर्ष:

यह फैसला सिर्फ एक मामले तक सीमित नहीं है, बल्कि एक बड़े सवाल को सामने लाता है- क्या कानून का इस्तेमाल न्याय के लिए हो रहा है या फिर निजी और सामाजिक दबावों के तहत उसका दुरुपयोग किया जा रहा है? हाईकोर्ट की सख्ती इस बात का संकेत है कि अब ऐसे मामलों में लापरवाही या मनमानी को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

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