मालेगांव ब्लास्ट केस: दो दशक बाद अदालत का फैसला और उठते सवाल

महाराष्ट्र के मालेगांव में 8 सितंबर 2006 को हुए सिलसिलेवार बम धमाकों ने पूरे देश को झकझोर दिया था। शब-ए-बारात के मौके पर बड़ा कब्रिस्तान, हमीदिया मस्जिद और मुशावरत चौक जैसे भीड़भाड़ वाले इलाकों में हुए इन विस्फोटों में 37 लोगों की दर्दनाक मौत हो गई थी और 200 से अधिक लोग घायल हुए थे। यह घटना न केवल मानवीय त्रासदी थी, बल्कि देश की जांच प्रणाली और न्यायिक प्रक्रिया के लिए भी एक बड़ी चुनौती बन गई।

करीब 20 साल बाद इस मामले में एक महत्वपूर्ण मोड़ तब आया, जब बॉम्बे हाई कोर्ट ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) द्वारा गिरफ्तार चारों आरोपियों लोकेश शर्मा, धन सिंह, राजेंद्र चौधरी और मनोहर नरवरिया को बरी कर दिया। अदालत ने स्पष्ट कहा कि आरोपियों के खिलाफ ऐसे पर्याप्त साक्ष्य नहीं हैं, जिनके आधार पर उनके खिलाफ आरोप तय किए जा सकें। इस तरह चार्ज फ्रेमिंग को ही खारिज कर दिया गया, जो इस केस में एक निर्णायक कानूनी कदम साबित हुआ।

इस मामले की जांच शुरुआत में महाराष्ट्र एटीएस को सौंपी गई थी। एटीएस ने अपनी जांच में प्रतिबंधित संगठन सिमी से संबंध जोड़ते हुए 9 मुस्लिम युवकों को गिरफ्तार किया और इसे इस्लामिक आतंकवाद का मामला बताया। यह धारणा कई वर्षों तक बनी रही और 2011 में केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने भी इसी दिशा में अपनी सहमति जताई।

हालांकि, 2010 में स्वामी असीमानंद के बयान ने इस पूरे मामले को एक नई दिशा दे दी। उनके दावों ने जांच की पुरानी थ्योरी पर सवाल खड़े किए। इसके बाद 2011 में एनआईए ने केस अपने हाथ में लिया और जांच का दृष्टिकोण पूरी तरह बदल गया। एनआईए ने 2013 में चार नए आरोपियों को गिरफ्तार किया और यह कहा कि पहले गिरफ्तार किए गए 9 लोगों के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं हैं।

इसी आधार पर 2021 में उन सभी 9 आरोपियों को बरी कर दिया गया। इस दौरान यह भी सामने आया कि एटीएस और एनआईए की जांच और चार्जशीट में गहरा अंतर था जहां एक एजेंसी इसे इस्लामिक आतंकवाद से जोड़ रही थी, वहीं दूसरी एजेंसी ने हिंदूवादी अतिवाद की संभावना जताई।

इस केस में 2019 में गिरफ्तार चारों आरोपियों को पहले ही जमानत मिल चुकी थी, और अब हाई कोर्ट के ताजा फैसले के बाद वे पूरी तरह बरी हो चुके हैं।

करीब दो दशकों तक चले इस मामले ने कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं—क्या जांच में शुरुआत से ही चूक हुई? क्या एजेंसियों के बीच समन्वय की कमी रही? और सबसे महत्वपूर्ण, इतने लंबे समय तक न्याय की प्रक्रिया में देरी का जिम्मेदार कौन है?

मालेगांव ब्लास्ट केस सिर्फ एक आपराधिक मामला नहीं, बल्कि यह भारत की जांच प्रणाली, न्यायिक प्रक्रिया और संस्थागत जवाबदेही पर एक गहरा चिंतन भी प्रस्तुत करता है। अदालत का यह फैसला कानूनी रूप से एक पड़ाव जरूर है, लेकिन इसके साथ जुड़े सवाल आज भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं।

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