यमन: यूएन मध्यस्थता के फलस्वरूप, 1,600 बन्दियों को रिहा किए जाने पर सहमति

यमन के लिए संयुक्त राष्ट्र के विशेष दूत हैंस ग्रुंडबर्ग ने, देश में हिंसक टकराव के दौरान हिरासत में लिए गए 1,600 बन्दियों को रिहा करने पर युद्धरत पक्षों में हुई सहमति का स्वागत किया है. जॉर्डन की राजधानी अम्मान में संयुक्त राष्ट्र के मध्यस्थता प्रयासों के तहत 14 सप्ताह तक चली वार्ता के बाद इसकी घोषणा की गई है.

यमन में पिछले एक दशक से अधिक समय से जारी गृहयुद्ध में, यह पहली बार है जब इतनी बड़ी संख्या में बन्दियों को रिहा किए जाने का निर्णय लिया गया है, और इससे देश में शान्ति स्थापना की दिशा में प्रयासों के आगे बढ़ने पर भी आशा व्यक्त की गई है.

विशेष दूत हैंस ग्रुंडबर्ग ने कहा कि हज़ारों यमनी नागरिकों के लिए यह एक गहरी राहत का क्षण है, जिन्होंने अपने परिवारजन की वापसी के लिए लम्बे समय तक पीड़ा को सहा है और उनकी प्रतीक्षा की है. 

“बन्दियों के परिवारों की स्फूर्त और साहसिक पैरवी ने, हमें इस पड़ाव तक पहुँचाने में अहम भूमिका निभाई है.”

वर्ष 2014 में, यमन में सरकारी बलों और हूथी लड़ाकों के बीच देश पर नियंत्रण के लिए टकराव भड़क उठा था. हूथी लड़ाकों (अंसार अल्लाह गुट) का राजधानी सना समेत देश के उत्तरी व पश्चिमी हिस्से पर क़ब्ज़ा है, जबकि अन्तरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त यमनी सरकार को सऊदी अरब के नेतृत्व में गठबंधन का समर्थन प्राप्त है, और यह दक्षिणी क्षेत्र में स्थित शहर अदन में स्थित है.

एक अनुमान के अनुसार, यमन में 2 करोड़ से अधिक लोगों को मानवीय राहत व संरक्षण सेवाओं की आवश्यकता है, जिनमें 52 लाख लोग आन्तरिक रूप से विस्थापित हैं. देश की अर्थव्यवस्था व बुनियादी ढाँचे को गहरी क्षति पहुँची है.

विशेष दूत ग्रैंडबुर्ग ने कहा कि यह एक स्पष्ट उदाहरण है कि निरन्तर और दृढ़ वार्ता के ज़रिए किस तरह से नतीजे हासिल किए जा सकते हैं. 

“यह साबित करता है कि जब [युद्धरत] पक्ष सम्वाद में शामिल होने का निर्णय लेते हैं, तो वे यमनी परिवारों के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्राथमिकताओं को पूरा कर सकते हैं और व्यापक शान्ति प्रक्रिया के लिए भरोसे का निर्माण भी.”

यूएन की केन्द्रीय भूमिका

संयुक्त राष्ट्र ने बन्दियों की रिहाई के लिए वार्ता को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जोकि रमदान के पवित्र महीने, ईद के त्यौहार और मध्य पूर्व में भड़के क्षेत्रीय तनाव के दौरान भी जारी रही. 

उन्होंने गुरूवार को पत्रकारों को बताया कि ये वार्ता असाधारण रूप से जटिल थी, और इसके लिए निरन्तर प्रयासों, लचीले रुख़ और सभी पक्षों की इच्छा की आवश्यकता थी.

यूएन के विशेष दूत के कार्यालय ने अन्तरराष्ट्रीय रैडक्रॉस समिति के साथ मिलकर इस वार्ता का समन्वय किया, और अब बन्दियों की रिहाई के लिए हुई सहमति को अमल में लाया जाएगा.

हैंस ग्रुंडबर्ग ने वार्ता की मेज़बानी के लिए जॉर्डन का आभार प्रकट किया है और ओमान व स्विट्ज़रलैंड में पहले हुई वार्ताओं की अहमियत को भी रेखांकित किया, जिसके बाद इस समझौते का मार्ग प्रशस्त हुआ.

उन्होंने योरोपीय संघ, जर्मनी, जापान, नैदरलैंड्स, स्विट्ज़रलैंड और ब्रिटेन समेत अन्य अन्तरराष्ट्रीय साझीदारों से प्राप्त वित्तीय व राजनैतिक समर्थन के लिए उनका धन्यवाद किया है.

कर्मचारियों की रिहाई का आग्रह

विशेष दूत ने संयुक्त राष्ट्र के उन कर्मचारियों की भी रिहाई की अपील दोहराई है, जिन्हें यमन में मनमाने ढंग से लम्बे समय से हिरासत में रखा गया है.

“मुझे आशा है कि आज तेज़ी से बढ़े इस क़दम के ज़रिए, यूएन व अन्य सहकर्मियों की रिहाई के प्रयासों को भी आगे ले जाया जा सकेगा, जिन्हें अभी मनमाने ढंग से हिरासत में रखा गया है.”

हैंस ग्रुंडबर्ग ने भरोसा व्यक्त किया है कि यह सहमति, सभी पक्षों के बाद पारस्परिक विश्वास के निर्माण में मदद कर सकती है, जिससे यमन में टिकाऊ शान्ति स्थापना के लिए समर्थन मिलेगा.

Source : UN News

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *