नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने असम की चार मुस्लिम महिलाओं के निर्वासन (डिपोर्टेशन) पर अंतरिम रोक लगाते हुए उन्हें बड़ी राहत दी है। ये वे महिलाएं हैं जिन्हें विदेशी न्यायाधिकरण (फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल) ने भारतीय नागरिक नहीं मानते हुए “विदेशी” घोषित किया था। फिलहाल चारों महिलाएं असम के गोलपारा जिले स्थित मटिया ट्रांजिट कैंप में हिरासत में हैं।
असम में “विदेशी घोषित” किए गए लोगों से आशय उन व्यक्तियों से होता है जिन्हें विदेशी न्यायाधिकरण उपलब्ध दस्तावेजों और साक्ष्यों के आधार पर भारतीय नागरिक साबित नहीं मानता। ऐसे मामलों में संबंधित व्यक्ति को अपनी नागरिकता के समर्थन में दस्तावेज पेश करने होते हैं। यदि न्यायाधिकरण उन दस्तावेजों को स्वीकार नहीं करता, तो व्यक्ति को विदेशी नागरिक घोषित किया जा सकता है।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति वी. मोहना की अवकाशकालीन पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार, असम सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया है। अदालत ने सभी पक्षों से चार सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है। सुप्रीम कोर्ट के इस हस्तक्षेप के बाद फिलहाल चारों महिलाओं के निर्वासन की प्रक्रिया पर रोक लग गई है।
याचिकाकर्ताओं में सालेहा खातून, सरभानु बेगम, मुस्तत नूरेजा बेगम और बसीरन नेसा शामिल हैं। इन महिलाओं ने अपने वकील फुजैल अहमद अय्यूबी के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिकाएं दाखिल कर गुवाहाटी हाईकोर्ट और विदेशी न्यायाधिकरण के फैसलों को चुनौती दी है।
याचिकाओं में कहा गया है कि उनकी नागरिकता साबित करने वाले दस्तावेजों को मामूली प्रशासनिक और तकनीकी त्रुटियों के आधार पर खारिज कर दिया गया। सालेहा खातून के मामले में 1971 से पहले के मतदाता रिकॉर्ड और अन्य दस्तावेज प्रस्तुत किए गए थे, लेकिन उम्र से जुड़ी कुछ विसंगतियों के आधार पर उन्हें स्वीकार नहीं किया गया।
इसी तरह, सरभानु बेगम की नागरिकता विभिन्न दस्तावेजों में उनके नाम की अंग्रेजी वर्तनी में अंतर होने के कारण अस्वीकार कर दी गई। मुस्तत नूरेजा बेगम को कथित गलतफहमी के चलते एकतरफा आदेश में विदेशी घोषित कर दिया गया था। वहीं, बसीरन नेसा का मामला कई वर्षों से लंबित है और उनके पास 1965 तथा 1989 की मतदाता सूचियों सहित वंश संबंधी दस्तावेज मौजूद हैं।
इस मामले ने असम में नागरिकता निर्धारण और निर्वासन की प्रक्रिया को लेकर एक बार फिर बहस छेड़ दी है। मानवाधिकार संगठनों और कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसी प्रक्रियाओं का सबसे अधिक असर गरीब, निरक्षर और हाशिए पर रहने वाले समुदायों पर पड़ता है।
गौरतलब है कि असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा पहले कह चुके हैं कि विदेशी घोषित किए गए अवैध प्रवासियों को शीघ्र बांग्लादेश भेजा जाएगा। दूसरी ओर, मानवाधिकार समूहों का आरोप है कि ऐसी नीतियां नागरिकता सत्यापन और उचित कानूनी प्रक्रिया से जुड़े आवश्यक सुरक्षा उपायों को कमजोर कर सकती हैं।
इसके अलावा हालिया अध्ययनों और रिपोर्टों में भी असम के विदेशी न्यायाधिकरणों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए गए हैं। आलोचकों का कहना है कि नागरिकता और निर्वासन संबंधी नीतियों का प्रभाव विभिन्न समुदायों पर समान रूप से नहीं पड़ रहा, जिससे भेदभाव और न्यायिक निष्पक्षता को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश से चारों महिलाओं को राहत मिली है। अब मामले की अगली सुनवाई में केंद्र और राज्य सरकार के जवाब के बाद आगे की कानूनी प्रक्रिया तय होगी।
