दल बदल, बाबा भारती और संघ का मुग़ल मॉडल

(गुरदीप सिंह सप्पल)

बड़े पैमाने पर दल-बदल भारतीय राजनीति की खास पहचान है। दूसरे लोकतंत्रों में कभी-कभार कोई नेता पाला बदलता है; हमारे यहाँ पूरे विधायक दल रातों-रात गायब हो जाते हैं और सरकारें चोरी हो जाती हैं।

पर हर दल-बदल एक जैसा नहीं होता। कुछ पार्टी से धोखा धोखा करते है, टिकट नहीं मिला, गुटबाज़ी हो गई, चले गए। कुछ नेता से धोखा करते हैं, अनबन जो गई तो चले गए। ये पुराने, मामूली राजनैतिक पाप हैं। लेकिन तीसरी किस्म का दल-बदल न पार्टी से धोखा है, न नेता से। वह जनता के भरोसे से धोखा है। आज का दौर इसी धोखे का दौर है।

सुदर्शन की एक अमर कहानी है ‘हार की जीत’। बाबा भारती के पास सुलतान नाम का घोड़ा था, जिस पर डाकू खड़गसिंह की नज़र थी। लेकिन वो घोड़ा छीनने में असफल रहा। फिर एक दिन वह अपाहिज का भेस बनाकर रास्ते में बैठ गया। जैसे ही बाबा भर्ती वहाँ से गुज़रे तो खड़क सिंह उनसे सवारी की भीख मांगने लगा। बाबा ने दया कर उसे जैसे ही घोड़े पर बैठाया, वो घोड़ा लेकर भाग निकला। बाबा ने पीछे से आवाज़ दी, रुकने को कहा। इसलिए नहीं कि उन्हें घोड़ा वापिस चाहिए तब। उन्होंने तो बस एक विनती की: घोड़ा ले जाओ, पर इसका ज़िक्र किसी से मत करना, वरना लोग किसी गरीब, किसी अपाहिज पर भरोसा नहीं करेंगे।

सुदर्शन की ये गहरी बात है। असली चोरी घोड़े की नहीं, भरोसे की होती है। बाबा को घोड़ा खोना मंज़ूर था, पर ऐसी दुनिया नहीं, जहाँ विश्वास से ही विश्वास उठ जाये। डाकू भी यह समझ गया और रात के अँधेरे में घोड़ा लौटा गया।

पर हमारे दल-बदलू नेता यह नहीं समझे। ज्योतिरादित्य सिंधिया या सायोनी घोष या उन जैसे अन्य कई हैं। बरसों धर्मनिरपेक्षता और संविधान की सबसे असरदार आवाज़ माने जाते थे, और फिर बिना पलक झपकाए उसी विचारधारा की गोद में जा बैठे, जिसके खिलाफ पूरे ज़ोर से बोलते थे। न कोई सफाई दी, न माफ़ी माँगी। उन समर्थकों से कोई संवाद नहीं किया, जो गली-मोहल्लों में इनके लिए लड़ते रहे। उन्हें बस ख़ारिज कर दिया। वे समर्थक आज भी उन्हीं विचारों की ध्वजा थामे खड़े हैं, जिन्हें उनके नेता तालाब के आगे न्योछावर कर चुके हैं।

ऐसा दल-बदल जनता का संशय पुख्ता कर जाता है कि विचारधारा बस सत्ता का मुखौटा भर है। ऐसे में सच्चे वैचारिक लोगों पर से भी विश्वास उठने लगता है। जो विचारधारा के लिए लाठियाँ खाता है, रोज़गार गँवाता है, बरसों गुमनाम संगठन का काम करता है, वो या तो बेवकूफ़ लगने लगता है या लगता है कि वो भी कोई छुपारुस्तम सौदागर भी निकलेगा। उसका संघर्ष नकली लगता है, कुर्बानी ढोंग।

सच कहें तो इस मौकापरस्ती की जड़ें बहुत पुरानी हैं। हम गर्व से इक़बाल की पंक्तियाँ गुनगुनाते हैं कि “कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी।” पर वह “कुछ बात” है क्या? जवाब असहज करता है। हमारी हस्ती इसलिए नहीं मिटी कि भारत के शासक वर्ग ने हर हमलावर का डटकर मुकाबला किया और उसे परास्त कर दिया। हस्ती इसलिए नहीं मिटती कि भारत के इलीट ने शायद ही कभी उसूलों पर स्टैंड लिया। तख़्त पर जो भी बैठा, इलीट वर्ग ने झुककर उसी की वफ़ादारी कबूल कर ली। भारतीय और हिंदू पढ़ा-लिखा बुद्धिजीवी वर्ग सुल्तानों, मुगलों, अंग्रेज़ों और अन्य राजाओं के दरबारों में आराम से नौकरी करता रहा। वो दरबार की शान में कसीदे पढ़ता रहा, चाकरी निभाता रहा, राज में शामिल होता रहा। हस्ती इसलिए नहीं मिटी, क्योंकि उसे किसी उसूल पर दाँव पर लगाया ही नहीं।

और गरीब-वंचित? वे तो भारत के शासक वर्ग की चिंताओं में, सरोकारों में कभी थे ही नहीं। वो हमेशा सत्ता के दायरे से बाहर रहे, दरबार से बाहर, यहाँ तक की गाँव के कुएँ की चौखट से भी बाहर। उन्होंने तो सत्ता के इस बहिष्कार को अपनी ही विमुख दर्शन में ढाल लिया कि ‘कोई नृप होय, हमें का हानी’। जब कोई राजा आपके लिए राज करता ही नहीं, तो राजा का चेहरा मायने क्यों रखे? ऊपर की मौकापरस्ती, नीचे की उदासीनता, दोनों उसी सच के अलग अलग पहलू थे, जिसमें सत्ता का और सिद्धांत का कोई नाता नहीं था।

गांधी और नेहरू का आदर्शवाद इसी पुरानी व्यवस्था के खिलाफ बगावत था। उन्होंने पहली बार इलिट वर्ग से कहा कि राजतंत्र सेवा नहीं करो, उसका विरोध करो। उन्होंने से इलीट वर्ग से त्याग माँगा और उस त्याग किया भी। बैरिस्टरों ने वकालत छोड़ी, नौजवान जेल गए, पढ़े लिखे प्रगतिशील लोग रजवाड़ों के खिलाफ खड़े हुए। बहुत से सुविधा-संपन्न लोग सरकार को अर्ज़ियाँ देने की जगह विरोध में सड़कों पर उतरने लगे।
पहली बार गरीबों-वंचितों से कहा गया कि शासक कौन है, यह तुम्हारा भी सवाल होना चाहिए। स्वराज की बात की, जिसका मतलब था कि गरीब और दमित वर्ग भी सत्ता और व्यवस्था के केंद्र में आए। वोट का अधिकार उसके हथियार हों और संविधान गारंटी। आज़ादी की सबसे बड़ी कमाई सत्ता का हस्तांतरण नहीं, “कोई नृप होय, हमें का हानी” वाली मानसिकता को तोड़ना था।

अब वही आदर्शवाद रौंदा जा रहा है। मौकापरस्ती का RSS सम्पूर्ण वैधता दे रहा है। वही RSS जो खुद को नैतिकता का सबसे बड़ा ठेकेदार बताता रहा है। संघ-भाजपा की सत्ता का पूरा दावा नैतिक राजनीतिक व्यवस्था के वादे पर टिका था : पार्टी विद अ डिफरेंस।कार्यकर्ताओं को घुट्टी पिलाई गई कि उनके संगठन का ‘चाल, चरित्र और चेहरा’ अलग है।

पर बनाया क्या? एक ऐसा देश, जहाँ पाखंड में किसी को शर्म अब महसूस नहीं होती है। वैचारिक गुलाटी मारना और आडम्बर से पूर्ण चरित्र अब राजधर्म है। किसी भी भ्रष्टाचारी को माला पहनाकर पार्टी में लेने में अब कोई शर्म नहीं है। नई वफ़ादारी का दरवाज़ा खुलते ही पुरानी फाइलों बंद कर दी जाती हैं। बीजेपी की ‘वॉशिंग मशीन’ अब आम जनता की ज़ुबान पर है। जो पार्टी सार्वजनिक जीवन को पवित्र करने आई थी, उसने उसूल बना दिया कि कोई पाप बुरा नहीं है। सब चलता है।

RSS का सपना एक ‘शुद्ध भारतीय’ राज-व्यवस्था का था, ऐसी व्यवस्था जो भारत की कथित परंपराओं पर आधारित हो। लेकिन पहुँचे कहाँ?

आज मोदी की शासन व्यवस्था उसी मुगल शासन-पद्धति की नकल है, जिसे वे दिन-रात कोसते हैं। मुगल साम्राज्य विचार से नहीं, वफ़ादारी से चलता था। सूबेदार-जागीरदार अपनी जागीर में जैसे चाहे राज करे, शर्त बस एक होती थी। दरबार में हाज़िरी लगाओ, झुका सिर लगान दो, बस। मोदी शाह का दरबार भी अब कुछ ऐसा ही है। कोई विचारधारा जो, कोई आरोप हों, कोई आधार हो, सब चलेगा, बस उनके दरबार में हाजिरी लगाने के लिए तैयार होना चाहिए। वही तरीके, वही आरोप, बस नए बादशाह को सलाम ज़रूरी है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की पार्टी ने भारत का सबसे पुराना सौदा फिर ज़िंदा कर दिया: विचार के बिना वफ़ादारी।

नरेंद्र मोदी इसे अपनी जीत ही मानेंगे। सच है कि उन्होंने विपक्षी नेताओं की पूरी पीढ़ी की विश्वसनीयता चकनाचूर कर दी है। दिखा दिया है कि धर्मनिरपेक्षता के कई बुलंद पैरोकारों की भी कीमत थी, और वह कीमत मोदी ने ढूँढ निकाली। पर ये तलवार तो दुधारी है।

विरोधियों की साख गिराते-गिराते मोदी ने अपने मातृ-संगठन का नकाब भी गिरा दिया है। RSS आज सच के सामने नग्न है, चाल, चरित्र, चेहरा तीनों की कलई अब उतर चुकी है। सौ साल चरित्र-निर्माण का दावा करने वाला संगठन सिर्फ सत्ता-संचय तक सीमित रह गया है, किसी भी तर्क से, किसी भी नैतिक कीमत पर, किसी भी टोटके से सिर्फ सत्ता और सिर्फ पैसे का बोलबाला। चना-चबैने पर जीने वाला प्रचारक अब विलासिता में है, और दूसरी पार्टियों से आने वाले भ्रष्ट संगी-साथियों की सोहबत में मस्त हैं। केवल नफ़रत फैला का अपने कर्तव्य की इतिश्री हो जाये, तो राष्ट्र निर्माण का बोझ क्योंकर उठाया जाये।

बाबा भारती का डर आज राष्ट्रीय पैमाने पर सच हो चुका। घोड़ा चोरी हो गया है, और ढिंढोरा भी पिट चुका है। विश्वास उठ रहा है। खतरा यह है कि जनता राजनीति पर ही भरोसा छोड़ न दे और वही पुरानी मानसिकता लौट न आए: कोई नृप होय, हमें का हानी। इस भरोसे को दोबारा खड़ा करना ही लोकतंत्र का असली काम है। यह संघ के सिपाही नहीं करेंगे। यह वही करेंगे, जो बाबा भारती की तरह जानते हैं कि कुछ चीज़ें घोड़े से ज़्यादा कीमती होती हैं।

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