जौहर यूनिवर्सिटी पर बुलडोज़र कार्रवाई का विरोध, MSO बोला— ‘इमारत नहीं, हजारों छात्रों के भविष्य पर चलेगा बुलडोज़र’

मुस्लिम स्टूडेंट्स ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इंडिया ने उत्तर प्रदेश सरकार से अधिग्रहण जैसे विकल्पों पर विचार करने की अपील की, कहा— शिक्षा संस्थानों को बचाना लोकतंत्र की प्राथमिकता होनी चाहिए।

उत्तर प्रदेश के रामपुर स्थित मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय पर प्रस्तावित बुलडोज़र कार्रवाई को लेकर मुस्लिम स्टूडेंट्स ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इंडिया यानी (MSO) ने कड़ी आपत्ति जताई है। संगठन का कहना है कि किसी विश्वविद्यालय को ध्वस्त करना केवल एक भवन को गिराना नहीं, बल्कि हजारों विद्यार्थियों की शिक्षा, उनके भविष्य और समाज की शैक्षणिक विरासत पर गंभीर चोट है।

MSO के राष्ट्रीय अध्यक्ष आरिफुल क़ादरी ने कहा कि यदि विश्वविद्यालय की स्थापना, भूमि या प्रशासनिक प्रक्रियाओं से जुड़े किसी भी प्रकार के कानूनी विवाद हैं, तो उनका समाधान भारतीय न्याय व्यवस्था और संवैधानिक प्रक्रिया के तहत होना चाहिए। उनके अनुसार, एक स्थापित शैक्षणिक संस्थान को बुलडोज़र से ध्वस्त करना न शिक्षा के हित में है और न ही समाज के दीर्घकालिक विकास के लिए उचित कदम माना जा सकता है।

इसके अलावा संगठन ने अपने बयान में यह भी कहा कि मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय की स्थापना वर्ष 2006 में हुई थी और पिछले करीब दो दशकों से यह हजारों विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा प्रदान कर रहा है। विश्वविद्यालय में विज्ञान, विधि, शिक्षा, वाणिज्य, इंजीनियरिंग एवं प्रौद्योगिकी, फार्मेसी, नर्सिंग, पैरामेडिकल साइंस और कृषि सहित कई विषयों की पढ़ाई कराई जाती है। इसके अलावा खेल और शोध से जुड़ी आवश्यक सुविधाएं भी यहां उपलब्ध हैं। MSO का कहना है कि ऐसा संस्थान किसी एक व्यक्ति या प्रबंधन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समय के साथ समाज की शैक्षणिक संपत्ति बन जाता है।

MSO ने यह भी कहा कि यदि किसी प्रकार की अनियमितता सिद्ध होती है, तो संबंधित व्यक्तियों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है। हालांकि, पूरे विश्वविद्यालय को ध्वस्त करने का निर्णय उन हजारों छात्रों, शिक्षकों और कर्मचारियों को प्रभावित करेगा, जिनका इन विवादों से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं है।

संगठन ने उत्तर प्रदेश सरकार से आग्रह किया कि यदि विश्वविद्यालय के संचालन या स्वामित्व को लेकर प्रशासन को आपत्ति है, तो सरकार विश्वविद्यालय का अधिग्रहण कर उसे अपने नियंत्रण में संचालित करने या किसी वैधानिक व्यवस्था के माध्यम से शिक्षा का क्रम जारी रखने जैसे विकल्पों पर विचार करे। MSO के अनुसार, शिक्षा संस्थानों को समाप्त करने के बजाय उन्हें संरक्षित और मजबूत करना किसी भी लोकतांत्रिक और प्रगतिशील समाज की प्राथमिकता होनी चाहिए।

संगठन का मानना है की भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में शिक्षा को राजनीतिक या प्रशासनिक विवादों का सबसे बड़ा नुकसान नहीं उठाना चाहिए। विश्वविद्यालय विचार, अनुसंधान, संवाद और राष्ट्र निर्माण के केंद्र होते हैं, इसलिए उन्हें सुरक्षित रखना सरकार, समाज और लोकतांत्रिक संस्थाओं की साझा जिम्मेदारी है।

अंत में MSO ने केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार से अपील की कि इस मामले में ऐसा समाधान निकाला जाए जिससे कानून का सम्मान भी बना रहे और विद्यार्थियों की शिक्षा तथा भविष्य भी सुरक्षित रह सके। साथ ही संगठन ने सभी राजनीतिक दलों, शिक्षाविदों, विश्वविद्यालयों और नागरिक समाज से इस मुद्दे पर रचनात्मक और संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाने का आह्वान किया।

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