बुलडोजर एक्शन पर सुप्रीम कोर्ट की दो-टुक: ‘हर मामले की जांच हम नहीं कर सकते, हाई कोर्ट तय करें सीमाएं’

अवैध निर्माणों पर चलते पीले पंजे और उसके खिलाफ अदालती सुरक्षा की जंग अब एक नए मोड़ पर पहुंच गई है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि ‘बुलडोजर कार्रवाई’ के खिलाफ सुरक्षा देने वाले ऐतिहासिक फैसले के कथित उल्लंघन के मामलों को वह सीधे खुद नहीं निपटाएगा। इसके बजाय, देश की शीर्ष अदालत ने इन मामलों की बागडोर सीधे संबंधित हाई कोर्ट के हाथों में सौंप दी है।

गुरुवार को मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने इस संवेदनशील मुद्दे पर एक महत्वपूर्ण सुनवाई की और न्याय के विकेंद्रीकरण (Decentralization) को प्राथमिकता दी।

सुप्रीम कोर्ट ने क्यों मोड़ा हाई कोर्ट्स की तरफ रुख?

सुनवाई के दौरान कोर्ट के सामने ऐसी कई अवमानना याचिकाएं आईं, जिनमें आरोप लगाया गया था कि नवंबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय की गई गाइडलाइंस का उल्लंघन कर संपत्तियों को तोड़ा जा रहा है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इन याचिकाओं पर सीधे सुनवाई करने से इनकार कर दिया।

बेंच ने इसके पीछे बेहद व्यावहारिक तर्क दिया:

हर केस की अपनी कहानी: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हर तोड़-फोड़ के मामले में अलग-अलग जमीनी तथ्य और स्थानीय विवाद शामिल होते हैं।

तथ्यों की सीधी जांच मुमकिन नहीं: सुप्रीम कोर्ट हर एक दावे की सच्चाई और उसके जमीनी तथ्यों की जांच खुद नहीं कर सकता।

दस्तावेजों का ट्रांसफर: कोर्ट ने आदेश दिया, “हम इन सभी कार्यवाहियों के रिकॉर्ड को संबंधित हाई कोर्ट्स को ट्रांसफर करना उचित समझते हैं।” अब इन मामलों पर संबंधित हाई कोर्ट्स ही फैसला करेंगे।

‘सजा’ के तौर पर कार्रवाई का आरोप और कोर्ट की लक्ष्मण रेखा

सुनवाई के दौरान एक वकील ने दलील दी कि कई मामलों में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय की गई कानूनी प्रक्रिया का पालन बिल्कुल नहीं किया गया। उन्होंने ऐसे कई उदाहरणों का हवाला दिया जहां इस तरह की तोड़-फोड़ को साफ तौर पर कानूनी प्रक्रिया के बजाय एक “सजा के तौर पर की गई कार्रवाई” की तरह इस्तेमाल किया गया।

इस पर बेंच ने एक बेहद जरूरी संतुलन रेखा खींची:

अवैध निर्माण को सुरक्षा नहीं: बेंच ने याद दिलाया कि नवंबर 2024 का फैसला विशेष रूप से उन मामलों को रोकने के लिए था, जहां अपराध के आरोपियों के घरों को सजा के तौर पर निशाना बनाकर गिराने का एक चलन बन गया था। हालांकि, कोर्ट ने साफ शब्दों में सचेत किया कि इस फैसले का मतलब यह कतई नहीं है कि यह अवैध निर्माणों को कोई सुरक्षा प्रदान करता है।

क्या थे नवंबर 2024 के वो कड़े नियम?

इस पूरे मामले की नींव 13 नवंबर 2024 को आए सुप्रीम कोर्ट के उस ऐतिहासिक फैसले पर टिकी है, जिसने देश भर में बुलडोजर की मनमानी कार्रवाई पर ब्रेक लगाने के लिए गाइडलाइंस तय की थीं:

कारण बताओ नोटिस (Show-Cause Notice): किसी भी संपत्ति को तब तक नहीं गिराया जा सकता, जब तक कि प्रभावित व्यक्ति को पहले एक ‘कारण बताओ नोटिस’ न दिया जाए।

15 दिन का समय: नोटिस मिलने के बाद प्रभावित व्यक्ति को अपनी बात रखने और जवाब देने के लिए कम से कम 15 दिनों का समय दिया जाना अनिवार्य है।

नियमों के अपवाद (जहां राहत नहीं मिलेगी):

कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी पूरी तरह साफ किया था कि यह 15 दिनों की सुरक्षा और नोटिस की गाइडलाइंस निम्नलिखित मामलों में लागू नहीं होंगी, यदि अनधिकृत ढांचा किसी सार्वजनिक जगह पर हो (जैसे कि सड़क, गली, फुटपाथ, रेलवे लाइन, या किसी नदी और जलाशय के पास)।

ऐसे मामले जहां खुद किसी अदालत ने तोड़-फोड़ का आदेश जारी किया हो।

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *