1857 की प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की चर्चा जब भी होती है, तो मेरठ, दिल्ली और झांसी के नाम ज़रूर लिए जाते हैं। लेकिन झारखंड की धरती पर भी एक ऐसा वीर था, जिसने अंग्रेज़ों के सामने आख़िरी सांस तक हार नहीं मानी। उनका नाम था — शेख भिखारी अंसारी।
1831 में रांची ज़िले के होक्टे गाँव में एक बुनकर (मोमिन/अंसारी) परिवार में जन्मे शेख भिखारी ने अपने साहस, नेतृत्व और देशभक्ति से इतिहास में अमिट पहचान बनाई। बाद में वे बड़कागढ़ के राजा ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव के दीवान बने और सेना की जिम्मेदारी संभाली।
1857 की क्रांति के दौरान उन्होंने टिकैत उमराव सिंह और अन्य क्रां-तिकारियों के साथ मिलकर अंग्रेज़ी सेना का डटकर मुकाबला किया। चुट्टूपालू घाटी में उन्होंने पुल तुड़वा दिए, रास्तों पर पेड़ गिरवाए और जब गो’ला-बा’रूद कम पड़ गया तो पहाड़ों से विशाल पत्थर लुढ़काकर अंग्रेज़ी सेना को भारी नुकसान पहुँचाया।
लेकिन अंततः अंग्रेज़ों ने स्थानीय जानकारी के सहारे उन्हें घेर लिया। 6 जनवरी 1858 को शेख भिखारी और टिकैत उमराव सिंह गि’रफ्तार कर लिए गए। फौजी अदालत ने तुरंत मृ’त्युदं’ड सुनाया और 8 जनवरी 1858 को दोनों अमर सेनानियों को चुट्टूपालू घाटी के बरगद के पेड़ पर फाँ-सी दे दी गई।
आज भी वह ऐतिहासिक स्थल और बरगद का पेड़ उनके अदम्य साहस और बलिदान की गवाही देता है।
ऐसे गुमनाम स्वतंत्रता सेनानियों को याद रखना हमारी जिम्मेदारी है, क्योंकि आज़ादी लाखों ज्ञात और अज्ञात ब’लिदानों की देन है।
क्या आपने आज से पहले शेख भिखारी अंसारी के बारे में सुना था?
Source : Indo-Islamic Heritage Center
