18 साल की उम्र में पहली किताब लिखकर, हजारों युवाओं के सपनों की आवाज बनीं सुराया फारूक।

जिस उम्र में युवा करियर की राह तलाशते हैं, उस उम्र में कश्मीर की एक बेटी ने अपनी कलम से अपनी ही पहचान बना ली18 साल की उम्र में पहली किताब लिखकर सुराया फारूक ने साबित कर दिया कि सपनों की कोई उम्र नहीं होती।कश्मीर की खूबसूरत वादियों से निकलकर एक 18 साल की लड़की आज अपनी कलम और किताब के जरिए हजारों युवाओं के लिए प्रेरणा बन रही है। नाम है सुराया फारूक, और उनकी कहानी है उस जुनून की, जिसने कम उम्र में ही उन्हें लेखन की दुनिया में एक अलग पहचान दिलाई।जम्मू-कश्मीर के बडगाम में जन्मी सुराया को बचपन से ही लेखन और कला में खास दिलचस्पी रही। इसी रुचि को उन्होंने सिर्फ शौक बनाकर नहीं छोड़ा, बल्कि अपने विचारों और भावनाओं को शब्दों में ढालना शुरू किया। नतीजा रहा उनकी पहली किताब “The Ones We Let In”

सिर्फ 18 साल की उम्र में किताब लिखना और उसे दुनिया के सामने लाना अपने आप में बड़ी उपलब्धि है। सुराया की किताब भरोसे, दोस्ती, रिश्तों, प्रेम और भावनात्मक उपचार जैसे विषयों को छूती है। यानी यह सिर्फ रिश्तों की कहानी नहीं, बल्कि उन भावनाओं की कहानी है, जिनसे आज की युवा पीढ़ी कहीं न कहीं गुजरती है।किताब का नाम “The Ones We Let In” भी अपने आप में बेहद खास है। जिंदगी में हम किन लोगों पर भरोसा करते हैं, किसे अपने करीब आने देते हैं और रिश्तों के अनुभव हमें किस तरह बदलते हैं सुराया ने इन्हीं भावनात्मक पहलुओं को अपनी लेखनी के जरिए सामने रखा है।

सुराया की कहानी इसलिए भी खास है क्योंकि उन्होंने अपनी उम्र को अपनी कमजोरी नहीं, बल्कि अपनी ताकत बनाया। उन्होंने यह दिखा दिया कि अगर जुनून सच्चा हो, तो शुरुआत करने के लिए किसी बड़े मंच या सही उम्र का इंतजार जरूरी नहीं।आज एक युवा कश्मीरी लेखिका के तौर पर सुराया की यह शुरुआत उन तमाम युवाओं को हौसला देती है, जो लिखना चाहते हैं, अपनी पहचान बनाना चाहते हैं, लेकिन उम्र या परिस्थितियों को अपनी राह की रुकावट मानते हैं।

बडगाम की सुराया फारूक की कहानी एक खूबसूरत संदेश देती है सपने बड़े हों तो उम्र छोटी होना मायने नहीं रखता, क्योंकि अगर भीतर कुछ कहने की चाह हो, तो शब्द अपनी राह खुद बना लेते हैं।

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