– दिलशाद नूर (एडवोकेट)
भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यहाँ हर नागरिक को अपने प्रतिनिधि चुनने और कानून के दायरे में चुनाव लड़कर जनता की सेवा करने का अधिकार है। फिर अगर कोई आलिम-ए-दीन अपने इल्म, अनुभव और सामाजिक जिम्मेदारी के साथ चुनावी मैदान में उतरना चाहता है, तो उसे राजनीति से दूर क्यों रखा जाए? क्या इसलिए कि वह आलिम है? क्या इसलिए कि उसका जीवन मस्जिद और मदरसे से जुड़ा रहा है? या इसलिए कि हमने यह मान लिया है कि दीन की बात करने वाला व्यक्ति देश और समाज के सार्वजनिक मामलों में भूमिका नहीं निभा सकता?
शायद अब इस सोच पर फिर से विचार करने का समय है। जो आलिम मिम्बर पर खड़े होकर इंसाफ, अमानत और गरीब के हक की बात करता है, वह भी इसी देश का नागरिक है। जिसने वर्षों तक समाज के बच्चों को पढ़ाया, लोगों के दुख-दर्द को करीब से देखा और समाज की समस्याओं को समझा, उसके लिए जनता के बीच जाकर उनकी आवाज बनना कोई अस्वाभाविक बात नहीं है।
भारत का लोकतंत्र किसान, मजदूर, शिक्षक, डॉक्टर और वकील—सभी के लिए है। फिर आलिम-ए-दीन के लिए क्यों नहीं? लोकतंत्र का मूल विचार यही है कि जनता जिसे अपना प्रतिनिधि समझे, उसे अपना प्रतिनिधि चुन सके।
इस्लाम में दीन केवल नमाज, रोजा और व्यक्तिगत इबादत तक सीमित नहीं है। वह इंसाफ, अमानत, कमजोर के हक और समाज के प्रति जिम्मेदारी की भी शिक्षा देता है। कुरआन अमानत को उसके हकदार तक पहुँचाने और लोगों के बीच फैसला इंसाफ से करने की बात करता है। साथ ही वह मशवरे को भी महत्व देता है।
भारत में आज जनता की राय और प्रतिनिधित्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक माध्यम चुनाव है। आधुनिक चुनाव को शुरुआती इस्लामी दौर की शूरा या बैअत के बिल्कुल समान मानना उचित नहीं होगा, लेकिन जनता की भागीदारी, प्रतिनिधित्व और जवाबदेही की भावना को आधुनिक लोकतंत्र में एक नए रूप में समझा जा सकता है।
इसलिए किसी आलिम का चुनाव लड़ना अपने आप में दीन से दूरी नहीं है। यदि उसका उद्देश्य सत्ता पाना नहीं, बल्कि समाज की सेवा और जनता की समस्याओं को सदन तक पहुँचाना है, तो राजनीति उसके लिए भी सेवा का एक माध्यम हो सकती है।
भारत की आजादी की लड़ाई का इतिहास भी इस बात का गवाह है कि उलेमा केवल मस्जिद और मदरसे तक सीमित नहीं रहे। स्वतंत्रता आंदोलन में अनेक उलेमा ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष किया, जनता को जागरूक किया, राजनीतिक आंदोलनों में भाग लिया और जेल तथा निर्वासन की कठिनाइयाँ झेलीं।
शेखुल हिंद मौलाना महमूद हसन का नाम इस संदर्भ में विशेष रूप से लिया जाता है। रेशमी रूमाल आंदोलन स्वतंत्रता संघर्ष का एक महत्वपूर्ण अध्याय था, जिसकी अगुवाई उन्होंने की। उनके साथ जुड़े कई उलेमा ने देश की आजादी के लिए कठिन परिस्थितियों का सामना किया।
बाद के दौर में भी मौलाना हुसैन अहमद मदनी और दूसरे उलेमा ने स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। गिरफ्तारी, जेल और राजनीतिक दबाव के बावजूद उनका सार्वजनिक जीवन से पीछे हटना आसान रास्ता नहीं था।
इस इतिहास से कम-से-कम इतना तो स्पष्ट होता है कि भारत में आलिम-ए-दीन की भूमिका हमेशा केवल धार्मिक शिक्षा देने तक सीमित नहीं रही। जब देश गुलामी में था, तब कई उलेमा ने अपने इल्म और प्रभाव का इस्तेमाल समाज और देश की बड़ी लड़ाई में किया।
आज देश आजाद है और व्यवस्था लोकतांत्रिक है। उस समय लड़ाई विदेशी शासन से आजादी की थी, आज जिम्मेदारी लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता की आवाज को मजबूत करने की है।
इस्लामी इतिहास में भी उलेमा केवल मिम्बर तक सीमित नहीं रहे। उन्होंने समाज का मार्गदर्शन किया, न्याय व्यवस्था में भूमिका निभाई, शासकों को सलाह दी और जरूरत पड़ने पर सत्ता के सामने अपनी स्वतंत्र राय भी रखी।
रसूलुल्लाह ﷺ ने मदीना में धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ एक समाज का नेतृत्व भी किया। विभिन्न समुदायों के बीच संबंध स्थापित किए, विवादों का समाधान किया और सामाजिक व्यवस्था कायम की। खिलाफत-ए-राशिदा के दौर में भी मशवरा, जनता से संबंध और जवाबदेही महत्वपूर्ण रहे।
इमाम अबू हनीफा رحمه الله इसका महत्वपूर्ण उदाहरण हैं। वे महान आलिम और फ़क़ीह थे, लेकिन सत्ता के दबाव के सामने अपनी स्वतंत्रता से समझौता नहीं किया। उनका जीवन बताता है कि आलिम का काम केवल सत्ता के करीब रहना नहीं, बल्कि जरूरत पड़ने पर सत्ता के सामने सच बोलना भी है।
आज सुल्तान का दरबार नहीं है। आज संसद, विधानसभा, नगर निकाय और पंचायतें हैं। जनता अपने प्रतिनिधि चुनती है। इसलिए अगर किसी दौर में आलिम शासक को सलाह दे सकता था और न्याय व्यवस्था में भूमिका निभा सकता था, तो आज लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता का प्रतिनिधि क्यों नहीं बन सकता?
एक आलिम मिम्बर पर लोगों से कहता है—झूठ मत बोलो, किसी का हक मत मारो, गरीब पर जुल्म मत करो और अमानत में खयानत मत करो। अगर वही व्यक्ति चुनाव जीतकर सदन में पहुँचता है तो उसके पास इन बातों को केवल कहने का नहीं, बल्कि सार्वजनिक जीवन में निभाने का अवसर भी होता है।
वह गरीब, किसान, मजदूर और बेरोजगार नौजवान की समस्याओं को सदन तक पहुँचा सकता है। शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे सवालों पर आवाज उठा सकता है और भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़ा हो सकता है।
यह बात भी गंभीरता से समझनी होगी कि जब अच्छे और ईमानदार लोग राजनीति से दूर रहते हैं तो राजनीति रुक नहीं जाती। उनकी जगह कोई और लेता है। इसलिए यह कहना कि “आलिम राजनीति में न आए” समस्या का समाधान नहीं है।
सवाल यह होना चाहिए कि अगर कोई आलिम ईमानदार है, समाज को समझता है, लोकतांत्रिक व्यवस्था में काम करने की क्षमता रखता है और जनता उसकी सेवा पर भरोसा करती है, तो उसे चुनाव लड़ने से क्यों रोका जाए?
लेकिन केवल आलिम का चुनाव लड़ना ही पर्याप्त नहीं है। अगर समाज चाहता है कि इल्म, इंसाफ और ईमानदारी की आवाज सदन तक पहुँचे, तो आलिमों को जिताकर सदन में भेजने की जिम्मेदारी भी समाज की है।
जब कोई आलिम जनता के बीच जाकर चुनाव लड़ता है, तो उसके काम और विचार को समझना और लोकतांत्रिक तरीके से उसका समर्थन करना भी समाज की जिम्मेदारी है।
आखिर अगर हम चाहते हैं कि मिम्बर पर इंसाफ की बात करने वाला व्यक्ति संसद या विधानसभा में भी इंसाफ की आवाज उठाए, तो उसे केवल चुनाव लड़ने के लिए नहीं, बल्कि जीतकर सदन तक पहुँचने के लिए भी समाज का भरोसा और समर्थन चाहिए।
“जब भारत का लोकतंत्र हर नागरिक को अपनी आवाज बनने का अधिकार देता है, तो इल्म और इंसाफ की आवाज सदन तक क्यों न पहुँचे?”
अगर कोई आलिम जनता के बीच जाकर चुनाव लड़ता है, जनता का भरोसा जीतता है और उस भरोसे को ईमानदारी से निभाता है, तो उसकी जीत केवल एक व्यक्ति की जीत नहीं होगी।
यह उस बच्चे की जीत होगी जो मदरसे में बैठकर पढ़ रहा है। यह उस गरीब की जीत होगी जिसकी आवाज अक्सर सत्ता तक नहीं पहुँचती। यह उस नौजवान की जीत होगी जो अपने भविष्य को लेकर परेशान है। और यह उस लोकतंत्र की जीत होगी जो मानता है कि इस देश में हर नागरिक की आवाज की कीमत है।
इसलिए आलिम को राजनीति से दूर रखने के बजाय हमें यह देखना चाहिए कि वह राजनीति में जाकर क्या करता है। क्योंकि— मिम्बर पर इंसाफ की बात करना अच्छी बात है, लेकिन संसद में इंसाफ के लिए खड़ा होना उससे बड़ी जिम्मेदारी है।
(लेखक पेशे से अधिवक्ता हैं और मानवाधिकार कार्यकर्ता भी हैं। वे पूर्व में राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पत्रकारिता से जुड़े रहे हैं तथा सामाजिक, कानूनी और जनसरोकार से जुड़े मुद्दों पर लगातार लिखते और सक्रिय रूप से कार्य करते रहे हैं।)
