काठमांडू: नेपाल में पिछले महीने आई भीषण बाढ़ और भूस्खलन की तबाही के पीछे जलवायु परिवर्तन की अहम भूमिका सामने आई है। World Weather Attribution (WWA) की नई स्टडी के मुताबिक, बढ़ते तापमान, ग्लेशियरों के पिघलने और पहले से मौजूद भूगर्भीय कमजोरियों ने मिलकर हालात को और गंभीर बनाया।
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस आपदा में करीब 1,400 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 6,150 से अधिक लोग अब भी लापता हैं। नेपाल-तिब्बत सीमा के आसपास बाढ़ और भूस्खलन से घरों और बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचा है।
स्टडी के मुताबिक, क्षेत्र में जुलाई-अगस्त के दौरान तापमान जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के कारण लगभग 1.5 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा। वहीं, ग्लेशियर हर साल करीब आधा मीटर तक पीछे हट रहे थे, जिससे पर्वतीय क्षेत्र की अस्थिरता बढ़ सकती है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, लांगटांग लिरुंग पर्वत के पास चट्टान और ग्लेशियर के ढहने से बाढ़ की भयावह स्थिति पैदा हुई। 2015 के नेपाल भूकंप से कमजोर हुई चट्टानी संरचनाओं को भी संभावित कारकों में शामिल किया गया है, हालांकि इसका सटीक प्रभाव अभी स्पष्ट नहीं है।
नेपाल अब इस अध्ययन को आधार बनाकर संयुक्त राष्ट्र के ‘Fund for Responding to Loss and Damage’ से करीब 2 करोड़ डॉलर की सहायता का दावा करने की तैयारी कर रहा है। सरकार का अनुमान है कि आपदा प्रभावित क्षेत्रों के पुनर्निर्माण के लिए करीब 5 अरब डॉलर की जरूरत पड़ सकती है।
हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन इस आपदा का एकमात्र कारण नहीं था और हिमालयी क्षेत्र में ऐसी घटनाओं की वजहों को पूरी तरह समझने के लिए अभी और शोध की जरूरत है।
