(तौसीफ़ रज़ा)
भारत का संविधान एक ऐसे समाज का ख़ाका पेश करता है जहाँ हर नागरिक की क़ानूनी बराबरी, धार्मिक आज़ादी, इंसानी गरिमा और इंसाफ़ को बुनियादी अहमियत हासिल है। दूसरी तरफ़, क़ुरआन और सुन्नत में भी इंसाफ़, अमानत, बराबरी, मशविरा, धार्मिक मामलों में जब्र से परहेज़ और इंसानी करामत जैसे उसूलों पर लगातार ज़ोर दिया गया है। यह ज़रूरी है कि इस्लामी तालीमात और आधुनिक संविधान को एक ही क़ानूनी दस्तावेज़ समझने के बजाय उनके नैतिक और सामाजिक उसूलों में मौजूद समानताओं को समझा जाए। भारत के मुसलमानों के लिए संविधान सिर्फ़ एक मुल्की दस्तूर नहीं, बल्कि ऐसा सामाजिक ढांचा भी है जिसमें वे अपनी दीनदार ज़िंदगी के साथ एक बहुलतावादी समाज के ज़िम्मेदार नागरिक के तौर पर अपना किरदार अदा कर सकते हैं।
क़ुरआन में इंसाफ़ का तसव्वुर बेहद वसीअ है। सूरह अन-निसा में कहा गया: “ऐ ईमान वालों! इंसाफ़ पर मज़बूती से क़ायम रहो और अल्लाह के लिए गवाही दो, चाहे वह गवाही ख़ुद तुम्हारे ख़िलाफ़ ही क्यों न हो।” (क़ुरआन 4:135) यहाँ इंसाफ़ को अपने फ़ायदे, रिश्तेदारी या व्यक्तिगत पसंद से ऊपर रखा गया है। सूरह अल-माइदा में भी हिदायत है कि किसी क़ौम की दुश्मनी इंसान को इंसाफ़ से दूर न करे। (क़ुरआन 5:8) आधुनिक संवैधानिक व्यवस्था में भी न्याय और क़ानून की बालादस्ती इसी बुनियादी विचार पर क़ायम है कि इंसाफ़ व्यक्ति की पहचान देखकर नहीं, बल्कि क़ानून और तथ्य की बुनियाद पर होना चाहिए।
क़ुरआन इंसानी गरिमा को भी अहमियत देता है: “और बेशक हमने बनी आदम को इज़्ज़त बख़्शी।” (क़ुरआन 17:70), यह तालीम इंसान को महज़ उसकी नस्ल, भाषा, क़ौम, माल या सामाजिक हैसियत से परिभाषित करने के बजाय उसकी बुनियादी इंसानी करामत को तस्लीम करती है। भारत का संविधान भी हर नागरिक को गरिमा के साथ जीने का हक़ देता है। इस संदर्भ में इस्लामी तालीमात का करामत-ए-इंसानी का तसव्वुर एक अहम नैतिक आधार प्रदान करता है। क़ुरआन की सूरह अल-हुजुरात में इंसानों की बुनियादी बराबरी को बहुत खूबसूरत अंदाज़ में बयान किया गया: “ऐ लोगो! हमने तुम्हें एक मर्द और एक औरत से पैदा किया और तुम्हें क़बीलों और बिरादरियों में बाँटा ताकि तुम एक-दूसरे को पहचानो।”
(क़ुरआन 49:13) इस आयत का मक़सद नस्ल, क़बीले और सामाजिक पहचान को मिटाना नहीं, बल्कि उन्हें इंसानी श्रेष्ठता का आधार बनाने से रोकना है। रसूलुल्लाह ﷺ की तालीमात में भी नस्ल और क़ौम की बुनियाद पर श्रेष्ठता के विचार को चुनौती दी गई। इस्लामी अख़लाक़ी तसव्वुर में किसी इंसान की क़ीमत केवल उसके नसब या क़बीले से तय नहीं होती। यही विचार आधुनिक संवैधानिक व्यवस्था में बराबरी और भेदभाव से परहेज़ के सिद्धांत से संवाद करता है।
क़ुरआन का एक अत्यंत स्पष्ट सिद्धांत है: “दीन के मामले में कोई ज़बरदस्ती नहीं।” (क़ुरआन 2:256), यह आयत धार्मिक विश्वास के मामले में जब्र के बजाय इख़्तियार की अहमियत को सामने रखती है। क़ुरआन रसूल ﷺ को भी लोगों पर ईमान लाने के लिए मजबूर करने का अधिकार नहीं देता। (क़ुरआन 10:99) इसका मतलब यह नहीं कि इस्लामी इतिहास में धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े सभी सवाल हमेशा एक ही तरीके से समझे गए; मुस्लिम फ़िक़्ह में अलग-अलग दौर और परिस्थितियों में विभिन्न राय मिलती हैं। लेकिन क़ुरआन की उक्त आयत धार्मिक विश्वास के मामले में ज़बरदस्ती के ख़िलाफ़ एक स्पष्ट नैतिक सिद्धांत पेश करती है। क़ुरआन सिर्फ़ मुसलमानों के बीच इंसाफ़ की बात नहीं करता, बल्कि उन लोगों के साथ भी नेकी और इंसाफ़ का हुक्म देता है जो मुसलमानों से जंग नहीं करते। सूरह अल-मुम्तहना में कहा गया: “अल्लाह तुम्हें उन लोगों के साथ नेकी और इंसाफ़ करने से नहीं रोकता जिन्होंने तुमसे दीन के मामले में जंग नहीं की।” (क़ुरआन 60:8), यह आयत बहुलतावादी समाज में शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व और सामाजिक संबंधों के लिए एक महत्वपूर्ण नैतिक आधार बन सकती है।
रसूलुल्लाह ﷺ के दौर का मिसाक़-ए-मदीना भी इस बहस में महत्वपूर्ण उदाहरण है। मदीना में विभिन्न क़बीलों और धार्मिक समूहों के बीच एक राजनीतिक-सामाजिक समझौते का ढांचा बनाया गया। इसकी ऐतिहासिक और फ़िक़्ही व्याख्याओं में मतभेद मौजूद हैं, इसलिए इसे सीधे आधुनिक संविधान या राष्ट्र-राज्य का समान रूप कहना सही नहीं होगा। लेकिन यह ज़रूर दिखाता है कि विभिन्न समुदायों के बीच साझा ज़िम्मेदारी, सुरक्षा और सामाजिक समझौते की गुंजाइश इस्लामी राजनीतिक इतिहास में मौजूद रही है। क़ुरआन कहता है: “और उनके मामले आपस के मशवरे से होते हैं।” (क़ुरआन 42:38), शूरा का मतलब मशविरा और सामूहिक विचार-विमर्श है। इसे आधुनिक लोकतंत्र का हूबहू पर्याय नहीं कहा जा सकता, लेकिन लोगों की राय सुनना और सामूहिक मामलों में मशविरा करना एक महत्वपूर्ण इस्लामी सामाजिक क़दर है। आज लोकतांत्रिक समाज में संसद, स्थानीय निकाय, चुनाव और सार्वजनिक बहस इसी व्यापक विचार को आधुनिक संस्थागत रूप देते हैं कि सार्वजनिक फ़ैसले समाज की भागीदारी और जवाबदेही के साथ हों।
क़ुरआन सत्ता और सार्वजनिक ज़िम्मेदारी को भी अमानत के रूप में पेश करता है: “अल्लाह तुम्हें हुक्म देता है कि अमानतें उनके हक़दारों तक पहुँचाओ और जब लोगों के बीच फ़ैसला करो तो इंसाफ़ के साथ फ़ैसला करो।”(क़ुरआन 4:58), रसूलुल्लाह ﷺ ने भी ज़िम्मेदारी और जवाबदेही को बहुत अहम बताया। सहीह बुख़ारी और सहीह मुस्लिम में है: “तुम में हर व्यक्ति निगरान है और हर व्यक्ति से उसकी रिआयत के बारे में सवाल किया जाएगा।”इस्लामी नज़रिए में ओहदा सिर्फ़ इख़्तियार नहीं, बल्कि ज़िम्मेदारी और जवाबदेही भी है। भारत की सामाजिक हक़ीक़त यह है कि यहाँ अलग-अलग मज़ाहिब, भाषाएँ, संस्कृतियाँ और परंपराएँ एक साथ मौजूद हैं। ऐसे समाज में संवैधानिक क़दरें तभी मज़बूत होंगी जब नागरिक अपने अधिकारों के साथ दूसरों के अधिकारों की भी हिफ़ाज़त करें। एक भारतीय मुस्लिम के लिए यह समझना अहम है कि दीन पर अमल और संविधान की पाबंदी को हर मामले में एक-दूसरे का विरोधी मानना ज़रूरी नहीं।
इंसाफ़, अमानत, बराबरी, इंसानी गरिमा और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व जैसे उसूल दोनों के बीच संवाद का रास्ता खोलते हैं। इस्लाम मुसलमान को सिर्फ़ अपने हक़ के लिए खड़े होने की तालीम नहीं देता, बल्कि इंसाफ़ को हर हाल में क़ायम करने की हिदायत देता है। क़ुरआन और सुन्नत की बुनियादी तालीमात में इंसाफ़, इंसानी करामत, बराबरी, अमानत, जवाबदेही, मशविरा और धार्मिक मामलों में जब्र से परहेज़ जैसे उसूल स्पष्ट रूप से मौजूद हैं। आधुनिक संविधान इन्हीं में से कई सामाजिक क़दरों को एक क़ानूनी और संस्थागत ढांचे में तब्दील करता है। इसलिए बहुलतावादी भारत में संवैधानिक क़दरों की हिफ़ाज़त को केवल क़ानूनी ज़िम्मेदारी के तौर पर नहीं, बल्कि इंसाफ़, अमानत और इंसानी गरिमा की उस साझा अख़लाक़ी विरासत के रूप में भी देखा जा सकता है, जो समाज को जोड़ने का काम करती है।
(लेखक, जामिया मिल्लीया इस्लामिया मे स्कालर हैं और इस्लामिक विषयों के जानकार हैं)
