इंटरनेशनल पॉलिटिक्स में मुल्कों के रिश्ते हमेशा जज़्बात या पुरानी दोस्ती की बुनियाद पर नहीं चलते, बल्कि उनके पीछे स्ट्रैटेजिक इंटरेस्ट, आर्थिक मुफ़ाद और बदलते हुए इलाक़ाई हालात की अहम भूमिका होती है। भारत और अज़रबैजान के रिश्ते इसकी एक दिलचस्प मिसाल हैं। पिछले कुछ अरसे में दोनों मुल्कों के दरमियान तल्ख़ी बढ़ी, लेकिन हालिया कूटनीतिक मुलाक़ातों ने रिश्तों में सुधार की नई उम्मीद पैदा की है। 23 अक्टूबर 2026 को भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने बाकू में अज़रबैजान के राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव और विदेश मंत्री जेहुन बायरामोव से मुलाक़ात की। इससे पहले सितंबर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अलीयेव की मुलाक़ात भी हुई थी। इन गतिविधियों से साफ़ है कि नई दिल्ली और बाकू अपने रिश्तों को दोबारा बेहतर बनाने के लिए कोशिश कर रहे हैं।
तल्ख़ियों की वजह: पाकिस्तान के साथ अज़रबैजान की नज़दीकियाँ
भारत और अज़रबैजान के बीच डिप्लोमैटिक रिश्ते 1992 में क़ायम हुए थे। दोनों मुल्कों के बीच तिजारत, ऊर्जा, टूरिज़्म और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के अच्छे मौक़े मौजूद रहे हैं। इसके बावजूद, पिछले कुछ वर्षों में पाकिस्तान के साथ अज़रबैजान की नज़दीकियों ने भारत के साथ उसके रिश्तों को प्रभावित किया। मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के बाद अज़रबैजान ने भारत की सैन्य कार्रवाई पर चिंता जताई और पाकिस्तान के साथ हमदर्दी का इज़हार किया। बाकू के इस रुख़ को भारत में आलोचनात्मक नज़र से देखा गया। दूसरी तरफ़, भारत के आर्मेनिया के साथ डिफ़ेंस और दूसरे क्षेत्रों में सहयोग ने भी भारत-अज़रबैजान संबंधों को जटिल बनाया है। हालाँकि, इन मतभेदों को दोनों मुल्कों के रिश्तों का अकेला पहलू समझना सही नहीं होगा। अज़रबैजान के अपने क्षेत्रीय और सुरक्षा संबंधी हित हैं, जबकि भारत की विदेश नीति उसके राष्ट्रीय हितों और स्ट्रैटेजिक प्राथमिकताओं से तय होती है।
कूटनीतिक पहल: रिश्तों को नई दिशा देने की कोशिश
विदेश मंत्री जयशंकर का बाकू दौरा इस लिहाज़ से अहम है कि लगभग आठ वर्षों बाद किसी भारतीय विदेश मंत्री ने अज़रबैजान का द्विपक्षीय दौरा किया। सितंबर में दोनों देशों के शीर्ष नेताओं की मुलाक़ात और अप्रैल 2026 में विदेश कार्यालयों के बीच हुई बातचीत ने भी रिश्तों को बेहतर बनाने की बुनियाद तैयार की। जयशंकर और बायरामोव की बातचीत में तिजारत, सरमायाकारी, ऊर्जा, टूरिज़्म और कनेक्टिविटी जैसे मुद्दे शामिल रहे। दोनों मुल्कों ने आर्थिक सहयोग को बढ़ाने और आपसी संपर्क को मज़बूत करने की संभावनाओं पर भी चर्चा की। यह पहल इस बात का संकेत है कि दोनों सरकारें पुराने मतभेदों को अपने तमाम द्विपक्षीय रिश्तों पर हावी नहीं होने देना चाहतीं। लेकिन यह भी याद रखना होगा कि कूटनीतिक मुलाक़ातें रिश्तों में सुधार का शुरुआती क़दम होती हैं; स्थायी भरोसा ठोस फ़ैसलों और लगातार सहयोग से पैदा होता है।

भारत के लिए अज़रबैजान की अहमियत
अज़रबैजान दक्षिण कॉकस क्षेत्र में एक अहम मुक़ाम रखता है। कैस्पियन सागर के किनारे स्थित यह मुल्क ऊर्जा संसाधनों और यूरोप तथा एशिया के बीच संपर्क के लिहाज़ से ख़ास अहमियत रखता है। भारत की ऊर्जा क्षेत्र में मौजूदगी भी अज़रबैजान से जुड़ी है। ओएनजीसी विदेश ने अज़रबैजान के अज़ेरी-चिराग़-गुनाशली तेल एवं गैस क्षेत्र और बाकू-त्बिलिसी-जैहान पाइपलाइन में हिस्सेदारी हासिल करने के लिए 1.2 अरब डॉलर से अधिक का निवेश किया है। यह साझेदारी बताती है कि दोनों देशों के आर्थिक रिश्तों की बुनियाद पहले से मौजूद है। इसके अलावा, इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) भारत के लिए एक अहम संपर्क मार्ग साबित हो सकता है। भारत, ईरान, कैस्पियन क्षेत्र और रूस को जोड़ने वाले इस कॉरिडोर के ज़रिए माल की आवाजाही और कारोबारी संपर्क बेहतर करने की संभावनाएँ हैं। जयशंकर के हालिया दौरे में इस कॉरिडोर पर सहयोग बढ़ाने के मुद्दे पर भी चर्चा हुई।
पाकिस्तान, आर्मेनिया और भारत की स्ट्रैटेजिक प्राथमिकताएँ
भारत-अज़रबैजान रिश्तों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि दोनों मुल्कों के क्षेत्रीय साझेदार और सुरक्षा संबंधी प्राथमिकताएँ अलग-अलग हैं। पाकिस्तान और अज़रबैजान के बीच क़रीबी रिश्ते हैं, जबकि भारत और आर्मेनिया के बीच डिफ़ेंस सहयोग मौजूद है। ऐसे हालात में भारत को अपनी कूटनीति में संतुलन बनाए रखना होगा। उसे अज़रबैजान के साथ आर्थिक और राजनीतिक सहयोग बढ़ाने के साथ-साथ आर्मेनिया के साथ अपने रिश्तों को भी अहमियत देनी होगी। इसी तरह, बाकू के लिए भी यह ज़रूरी है कि वह भारत की सुरक्षा संबंधी चिंताओं को गंभीरता से समझे। किसी भी मुल्क के साथ बेहतर रिश्ते तभी टिकाऊ होते हैं, जब उनमें एक-दूसरे के हितों और संवेदनशीलताओं का सम्मान शामिल हो।

आगे का रास्ता
भारत और अज़रबैजान के बीच रिश्तों में सुधार की मौजूदा कोशिशों को एक सकारात्मक शुरुआत कहा जा सकता है। लेकिन इसकी कामयाबी इस बात पर निर्भर करेगी कि दोनों सरकारें बातचीत को ठोस आर्थिक सहयोग, नियमित कूटनीतिक संपर्क और आपसी भरोसे में किस हद तक बदल पाती हैं। भारत के लिए यह मौक़ा है कि वह अपने राष्ट्रीय हितों को सामने रखते हुए अज़रबैजान के साथ व्यावहारिक रिश्ते आगे बढ़ाए। वहीं, अज़रबैजान के लिए भारत एक बड़ा बाज़ार, अहम आर्थिक साझेदार और अंतरराष्ट्रीय मामलों में प्रभावशाली मुल्क है। आख़िरकार, इंटरनेशनल पॉलिटिक्स में स्थायी रिश्ते केवल बयानों से नहीं बनते। उनके लिए भरोसा, निरंतरता और एक-दूसरे के हितों की समझ ज़रूरी होती है। अगर नई दिल्ली और बाकू इस दिशा में आगे बढ़ते हैं, तो पुरानी तल्ख़ियों के बावजूद दोनों मुल्क अपने रिश्तों को एक नई दिशा दे सकते हैं। अब असल सवाल यह है कि क्या यह कूटनीतिक पहल महज़ मुलाक़ातों तक सीमित रहेगी, या भारत और अज़रबैजान के रिश्तों में वास्तव में एक नए दौर की शुरुआत होगी?
