“एक खत, एक जंग और उस्मानी सल्तनत की हुई शिकस्त”

आज के दिन ही, 20 जुलाई 1402 ई. को 15वीं सदी की दुनिया दो बड़ी ताकतें अंकारा के मैदान में एक दूसरे के आमने-सामने आ गयीं थीं। तारीख की इस फैसलाकुन जंग में एक तरफ तैमूरी सल्तनत के बानी अमीर तैमूर थे तो दूसरी तरफ सल्तनते उस्मानिया के चौथे सुल्तान बायजीद । थे। जंग के खात्मे तक उस्मानी सुल्तान अमीर तैमूर की कैद में थे और सल्तनते उस्मानिया को एक तारीखी शिकस्त से दोचार होना पड़ा था।

15वीं सदी के शुरुआत तक तैमूर लंग की बढ़ती सरहदें अब उस्मानी सरहदों को छूने लगीं थीं। दोनों ही अपने समय के ताकतवर हुक्मरान थे। एक ने एशिया तो दूसरे ने यूरोप में अपनी धाक जमा रखी थी। अमीर तैमूर को सल्तनते उस्मानिया पर हमला करने के लिए कोई ठोस बहाना चाहिए था। सो उसने एक तरकीब निकाल ली अमीर तैमूर अपने आप को चंगेज खान का वंशज मानता था। तो उसके हिसाब से अनातोलिया के कुछ समय पहले तक मंगोलों के कब्जे वाले इलाकों पर उसका अधिकार था।

जिसे उस्मानियों ने मकामी हुक्मरानों से लड़ कर जीत लिया था। अमीर तैमूर ने सुल्तान बायजीद को एक खत लिखा जिसमें उसने इस बात का जिक्र किया की “तुमने गैरमुस्लिमों से जो इलाके फ़तेह किये हैं उसे अपने पास रखो लेकिन इसके आलावा जो इलाके तुमने दूसरे हुक्मरानों से छीनें हैं उसे उन्हें वापस कर दो। वरना मैं खुदा का कहर बन कर तुम से बदला लूंगा”।

ये देख कर जाहिर है अब सुल्तान बायजीद भी चुप नहीं बैठने वाले थे उसने भी अमीर तैमूर को बहुत सख्त लहजे में एक जवाबी खत रवाना किया जिसमे उसने इस बात का जिक्र किया की “क्योंकि तुम्हारे बे ऐब ख्वाहिशों और लालचों की कश्ती खुदगर्जी के घड़े में उतर चुकी है। तो तुम्हारे लिए बेहतर यही होगा की अपने उतावलेपन की पाल को कम कर लो और खुलूस की साहिल पर पछतावे का लंगर डाल दो। क्यूंकि सलामती का साहिल भी यही है। वरना हमारे इन्तेक़ाम के तूफान से तुम सजा के उस समंदर में हलाक हो जाओगे जिसके तुम मुस्तहिक़ हो”।

इस खत के बाद अब दोनों ही हुक्मरानों के बीच जंग तय हो गयी थी। जंग की पहल अमीर तैमूर ने की उसने कुछ उस्मानी किलों को फतह कर लिया। असल जंग अंकारा के मैदान में 20 जुलाई 1402 ई. को लड़ी गयी। जिसमे उस्मानी तुर्कों को तारीखी शिकस्त से दोचार होना पड़ा था। जंग के इख्तेताम तक अमीर तैमूर ने उस्मानी सुल्तान बायज़ीद I को अपना कैदी बना लिया था।

तारीख में न इससे पहले कभी और न ही इस वाकये के बाद कभी कोई उस्मानी सुल्तान अपने किसी दुश्मन का कैदी बना था। ये उस्मानियों के लिए एक बदतरीन शिकस्त थी।

यूरोप में सुल्तान बायजीद की कैद के दौरान हुए अपमान की कथा बहुत मशहूर थी। इस बारे में कई यूरोपीय लेखकों ने अलग-अलग कहानियां अपनी किताबों में लिखी हैं।

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *