वज़ीर अली ख़ान को हिन्दुस्तान में अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ शुरुआती बग़ावत का बहादुर सिपाही माना जाता है। सन 1799 में, 1857 से 58 साल पहले, उन्होंने बनारस से अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ जंग छेड़ दी थी। नवाब आसिफ-उद-दौला के गोद लिए बेटे वज़ीर अली को अंग्रेज़ों ने गद्दी से हटाकर उनके चाचा सआदत अली ख़ान को नवाब बना दिया और वज़ीर अली को बनारस भेज दिया। यह धोखा उनके दिल में अंग्रेज़ों के लिए गहरी नफ़रत छोड़ गया।
अंग्रेज़ जब उन्हें बनारस से कलकत्ता भेजने लगे तो वज़ीर अली ने अपने साथी इज्ज़त अली और वासिर अली के साथ मिलकर गुप्त योजना बनाई। 14 जनवरी 1799 को उन्होंने कमांडर जॉर्ज फ़्रेडरिक चेरी के घर पर हमला किया और चेरी समेत कई अंग्रेज़ अफ़सरों को मार डाला। इस घटना से पूरे इलाक़े में बग़ावत की आग फैल गई।
वज़ीर अली और उनके मुजाहिदीनों ने अंग्रेज़ी फ़ौज को कड़ी टक्कर दी, मगर भारी अंग्रेज़ी फ़ौज के सामने टिक न सके। वह राजस्थान से बूंदी और फिर जयपुर पहुँचे, लेकिन जयपुर के राजा ने धोखे से उन्हें अंग्रेज़ों के हवाले कर दिया। अंग्रेज़ों ने वज़ीर अली को कलकत्ता की विलियम जेल भेज दिया, जहाँ उन्होंने 17 साल कैद में गुज़ारे।
वज़ीर अली ख़ान का यह विद्रोह 1857 से पहले आज़ादी की लड़ाई का एक सुनहरा और प्रेरणादायक वाक़या है।
