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हबीबा का जन्म 1833 में उत्तर प्रदेश के एक गांव में गूजर ख़ानदान में हुआ था। बचपन से ही उनमें हिम्मत और आत्म-एतबार नज़र आता था। 1857 की आज़ादी की पहली जंग में उन्होंने अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ खुलकर मुकाबला किया।
हबीबा ने अपने इलाक़े के लोगों को इकट्ठा किया और उन्हें अंग्रेज़ी हुकूमत के ख़िलाफ़ खड़े होने के लिए तैयार किया। जंग के दौरान उन्होंने इंक़लाबियों की मदद की, गुप्त पैग़ाम पहुँचाए और प्लान को कामयाब बनाने में अहम किरदार निभाया। उनकी हिम्मत ने इलाक़ाई सतह पर आज़ादी की जद्दोजहद को नई ताक़त दी।
उनका हिस्सा यह साबित करता है कि आज़ादी की जंग में औरतें भी मर्दों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ीं। हबीबा की बहादुरी और कुर्बानी आने वाली नस्लों के लिए मिसाल बन गई और वह तारीख़ में एक निडर आज़ादी के सिपाही के तौर पर याद की जाती हैं।
