आज़ादी की जद्दोजहद में रेहाना तैयबजी का योगदान

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26 जनवरी 1900 को बड़ौदा (गुजरात) में पैदा हुईं रेहाना तैय्यबजी, मशहूर शख़्सियत अब्दुल क़य्यूम तैय्यबजी और अमीनी तैय्यबजी की बेटी थीं। बचपन से ही उन्हें दीनी और क़ौमी तालीम मिली। उन्होंने सेंट्रल स्कूल, इंग्लिश हाई स्कूल और आगे चलकर अलीगढ़ से तालीम हासिल की।

रेहाना तैय्यबजी न सिर्फ़ तालीम में बल्कि तहरीर और शायरी में भी माहिर थीं। उन्होंने “उस्तानी साहिबा”, “प्यारी रेहाना” और “फरहतुल लज़ीज़” जैसे तख़ल्लुस से लिखा और नौजवानों में क़ौमी जागरूकता पैदा की।

वो कांग्रेस के जलसों में शिरकत करतीं और गांधीजी के साथ क़दम से क़दम मिलाकर चलतीं। गांधीजी ने यरवदा जेल (पूना) से रहना को कई ख़ुतूत लिखे और उन्हें “प्यारी बेटी रेहाना” कहकर बुलाया। इन ख़तों में उन्होंने रेहाना की क़ाबिलियत, सादगी और जज़्बे की तारीफ़ की।

रेहाना तैय्यबजी शराब और फिज़ूलखर्ची के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करने वाली पहली मुस्लिम औरत थीं। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में उन्हें गिरफ़्तार कर तक़रीबन 60 औरतों के साथ नागपुर जेल भेजा गया।

रेहाना तैय्यबजी ने पूरी ज़िंदगी क़ौम और आज़ादी के नाम कर दी। वो सिर्फ़ एक शायरा या तालीबा नहीं थीं, बल्कि जंग-ए-आज़ादी की सच्ची मुजाहिदा थीं।

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