शेख़ मौला साहब : परितला के आज़ादी के सिपाही

आंध्र प्रदेश के कृष्णा ज़िले के परितला गांव में 1922 में जन्मे शेख़ मौला साहब ने बचपन से ही आज़ादी की लड़ाई का रास्ता चुना। गरीबी और मुश्किल हालात के बावजूद उन्होंने उर्दू और तेलुगु की पढ़ाई कर ली और नौजवानों में आज़ादी का जोश जगाने लगे।

युवावस्था में ही मौला साहब ने अपने साथियों के साथ परितला रिपब्लिक की आज़ादी का एलान कर हैदराबाद में तिरंगा फहराया। इस साहसिक कदम ने उन्हें इलाके का नायक बना दिया। 1947 के बाद भी जब निज़ाम का राज जारी रहा, तब उन्होंने सरकारी इमारतों पर झंडा फहराकर निज़ाम के ख़िलाफ़ विद्रोह किया। इसके लिए उन्हें तीन साल की जेल हुई।

जेल से निकलने के बाद भी उन्हें अंग्रेज़ समर्थक जागीरदारों और अफ़सरों के विरोध का सामना करना पड़ा। उनके परिवार का सामाजिक बहिष्कार किया गया, लेकिन मौला साहब डटे रहे। उनकी बहादुरी की खबर महात्मा गांधी तक पहुंची, जिसके बाद परितला को भारतीय गणराज्य का हिस्सा बनाया गया।

91 साल की उम्र तक मौला साहब समाज और नौजवानों को स्वराज और क़ुर्बानी का सबक़ देते रहे। 2013 में उनके इंतकाल के साथ आज़ादी की लड़ाई का एक चमकता सितारा बुझ गया।

शेख़ मौला साहब की कहानी आज भी नौजवानों को हिम्मत और देशभक्ति का पैग़ाम देती है।

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