कनीज़ सैय्यदा बेगम : आज़ादी की लड़ाई की निडर सिपाही

भारत की आज़ादी की जंग में कनीज़ सैय्यदा बेगम का नाम महिलाओं की बहादुर आवाज़ के रूप में लिया जाता है। 1890 में जन्मीं बेगम साहिबा बचपन से ही अंग्रेज़ी हुकूमत के ज़ुल्म से प्रभावित रहीं। यही कारण था कि उन्होंने अपने जीवन को देश की आज़ादी के नाम कर दिया।

1931 में जब सिविल नाफ़रमानी आंदोलन शुरू हुआ, तो कनीज़ सैय्यदा बेगम ने खुलकर इसमें हिस्सा लिया। उन्होंने औरतों को घरों से बाहर निकलकर आंदोलन से जुड़ने के लिए प्रेरित किया। उनका मानना था कि जब तक समाज का हर तबक़ा आगे नहीं आएगा, अंग्रेज़ों का देश से बाहर निकालना मुश्किल होगा।

1941 में उन्होंने मुस्लिम लीग की सियासत का विरोध करते हुए कांग्रेस का साथ दिया। वो कांग्रेस के मंच से महिलाओं को संगठित करती रहीं और उन्हें आज़ादी की लड़ाई का अहम हिस्सा बनाया। 1945 में उन्हें ‘कांग्रेस औरतों की कमेटी’ में शामिल किया गया, जहाँ उनकी भूमिका बेहद सक्रिय और प्रभावी रही।

1955 में उनका निधन हो गया, लेकिन वे अपनी आख़िरी साँस तक आज़ादी और समाज की सेवा में जुटी रहीं। कनीज़ सैय्यदा बेगम का योगदान भारतीय इतिहास में हमेशा औरतों के हौसले और संघर्ष की मिसाल बनकर याद किया जाएगा।

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