पटना, 31 अगस्त 1871 — बिहार के नेउरा गाँव में जन्मे सैय्यद हसन इमाम ने अपनी ज़िंदगी देश की आज़ादी के लिए समर्पित कर दी। शुरुआती पढ़ाई पटना से करने के बाद वे इंग्लैंड गए और वहाँ इंडियन स्टूडेंट्स एसोसिएशन से जुड़कर ब्रिटिश हुकूमत के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद की। क़ानून की पढ़ाई पूरी कर वतन लौटे तो वकालत शुरू की, लेकिन जल्द ही जंगे-आज़ादी की राह पकड़ ली।
1908 में मद्रास कांग्रेस से उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन में क़दम रखा और जल्द ही पटना में बिहार स्टेट स्टूडेंट्स कॉन्फ्रेंस की स्थापना की। हसन इमाम का मानना था कि हिंदू-मुस्लिम की एकता ही अंग्रेज़ों को हराने का सबसे बड़ा हथियार है। उन्होंने कांग्रेस और मुस्लिम लीग को मिलकर संघर्ष करने की अपील की। इसका असर 1919 के रॉलेट एक्ट विरोधी आंदोलन में दिखा, जब दोनों दलों के नेता एक साथ अवाम को ख़िताब करते थे।
हसन इमाम ने स्वदेशी लीग बनाकर आंदोलन की अगुवाई की और जनता को विदेशी सामान के बहिष्कार के लिए प्रेरित किया। वे हमेशा कहते थे कि “बँटवारे से मुल्क का नुक़सान होता है, इसलिए हर हाल में एकता ज़रूरी है।”
19 अप्रैल 1933 को हसन इमाम ने आख़िरी सांस ली। वे अपनी क़ुर्बानियों और नेतृत्व के लिए हमेशा हिंदुस्तान की आज़ादी के सच्चे सिपाही के रूप में याद किए जाएंगे।
