संघर्ष से सफलता तक: एडवोकेट मोहम्मद रफ़ीक़ चौहान की प्रेरक कहानी

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कहते हैं कि मेहनत और नीयत साथ हो तो किस्मत भी रास्ता बदल देती है। एडवोकेट मोहम्मद रफ़ीक़ चौहान की ज़िंदगी इसका सुंदर उदाहरण है। करनाल के उचाना गाँव के एक साधारण किसान परिवार में जन्मे चौहान के पास संसाधन कम थे, लेकिन सपने बहुत बड़े। घर की मजबूरियाँ उन्हें कभी घरेलू कामगार बनाने को तैयार थीं, पर वे शिक्षा छोड़ने को तैयार नहीं हुए।

कभी साइकिल पर सामान बेचा, कभी चाय की दुकान चलाई, तो कभी Compounder बनकर काम किया। रेडियो-ट्रांजिस्टर ठीक करना सीखा और 1975 से 1995 तक अपनी दुकान चलाई। दिन में कॉलेज और शाम को दुकान, इसी संघर्ष के साथ उन्होंने M.A. पूरा किया।

लेकिन उनका सपना सिर्फ पढ़ना नहीं था शिक्षा फैलाना भी था। 1983 में गीता पब्लिक स्कूल और 1984 में सरस्वती पब्लिक स्कूल की स्थापना करके उन्होंने समाज को शिक्षित करने का बीड़ा उठाया। आज उनके बेटे इन संस्थानों को आगे बढ़ा रहे हैं, जहाँ पढ़ाई के साथ नैतिक मूल्यों की मजबूत नींव रखी जाती है।

1997 में कानून की राह चुनी और इसके बाद से चौहान सिर्फ वकील नहीं, बल्कि मज़लूमों का सहारा बन गए। गरीबों के केस मुफ्त में लड़ना, कागज़ात का खर्च खुद उठाना, और महिलाओं को न्याय दिलाने के लिए हर संभव कोशिश, यही उनका जीवन मिशन बन गया।

इसके अलावा वे युवाओं को मार्गदर्शन देते हैं, ऑनलाइन समूहों के ज़रिए कानूनी और सामाजिक जागरूकता फैलाते हैं, और हरियाणा मुस्लिम खिदमत सभा के माध्यम से शिक्षा, स्वास्थ्य और महिलाओं के अधिकारों पर निरंतर काम करते हैं।

चौहान की कहानी बताती है कि जब जज़्बा बड़ा हो तो छोटी शुरुआत भी बड़ी सफलता बना देती है।

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