Palestine Center for Prisoner Studies की एक चौंकाने वाली रिपोर्ट ने इसराइली जेल व्यवस्था की सख़्त हक़ीक़त उजागर कर दी है। रिपोर्ट के अनुसार, साल 2025 के दौरान इसराइली क़ब्ज़ा अधिकारियों ने 7,715 से अधिक प्रशासनिक हिरासत आदेश जारी किए, जिनके तहत फ़िलिस्तीनियों को बिना किसी आरोप, मुक़दमे या अदालत में पेश किए सीधे जेल भेज दिया गया।
रिपोर्ट बताती है कि प्रशासनिक हिरासत अब एक असाधारण क़ानूनी क़दम नहीं, बल्कि फ़िलिस्तीनियों के ख़िलाफ़ संगठित और व्यापक दमन नीति बन चुकी है। हज़ारों लोग ऐसे गुप्त ख़ुफ़िया दस्तावेज़ों के आधार पर बंद हैं, जिनकी जानकारी न क़ैदियों को दी जाती है और न ही उनके वकीलों को। इन सभी फ़ाइलों की निगरानी इसराइल की खुफ़िया एजेंसी शिन बेट करती है।
केंद्र के निदेशक और शोधकर्ता रियाद अल-अशकर के मुताबिक़, 7 अक्टूबर 2023 को ग़ज़्ज़ा पर शुरू हुई जंग के बाद से इस नीति में अभूतपूर्व तेज़ी आई है। उस समय से अब तक 17,000 से ज़्यादा प्रशासनिक हिरासत आदेश जारी किए जा चुके हैं। कई क़ैदियों को बार-बार हिरासत बढ़ाकर तीन साल तक जेलों में रखा गया, वो भी बिना किसी क़ानूनी सज़ा के।
वेस्ट बैंक और क़ब्ज़े वाले यरुशलम में बड़े पैमाने पर गिरफ़्तारियों ने हालात और गंभीर कर दिए हैं। इस समय इसराइली जेलों में 3,400 से अधिक प्रशासनिक क़ैदी बंद हैं, जो कुल 9,500 क़ैदियों का लगभग 35 प्रतिशत हैं। जंग से पहले यह संख्या सिर्फ़ 1,300 थी, यानी प्रशासनिक हिरासत में बंद लोगों की तादाद लगभग तीन गुना हो चुकी है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि इस नीति ने फ़िलिस्तीनी समाज के हर तबके को अपनी चपेट में ले लिया है। छात्र, शिक्षक, सामाजिक कार्यकर्ता, महिलाएं, निर्वाचित प्रतिनिधि—यहां तक कि बच्चे भी इससे अछूते नहीं रहे। इस समय 18 साल से कम उम्र के करीब 80 बच्चे प्रशासनिक हिरासत में हैं।
कई मामलों में रिहाई अब आज़ादी नहीं बन पाई है। अल-अशकर के अनुसार, बड़ी संख्या में क़ैदियों को जेल से छूटते ही नए प्रशासनिक आदेशों के तहत दोबारा गिरफ़्तार कर लिया जाता है। कुछ को तो अदालत की सज़ा पूरी करने के बाद भी जेल में ही रखा गया है।
यह नीति हालिया क़ैदी अदला-बदली समझौते से रिहा हुए फ़िलिस्तीनियों पर भी लागू की गई। कई पूर्व क़ैदियों को, जिन्होंने सालों जेल में बिताए थे, रिहाई के कुछ ही समय बाद फिर से हिरासत में लेकर नए प्रशासनिक आदेश थमा दिए गए।
रिपोर्ट यह भी उजागर करती है कि प्रशासनिक क़ैदियों की आधिकारिक गिनती में गाज़ा के 1,200 से अधिक क़ैदी शामिल ही नहीं हैं, जिन्हें इसराइल “ग़ैर-क़ानूनी लड़ाका” बताकर बिना आरोप, बिना मुक़दमे और बिना समय-सीमा के कैद में रखे हुए है। अंतरराष्ट्रीय क़ानून और चौथे जिनेवा कन्वेंशन के तहत इन नागरिकों को क़ानूनी संरक्षण मिलना चाहिए।
हालांकि, पिछले साल हुए क़ैदी अदला-बदली समझौते के बाद इस श्रेणी में रखे गए क़ैदियों की संख्या में कमी आई, जब 2,000 से अधिक गाज़ा के क़ैदी रिहा किए गए। इससे पहले इसराइल ने ऐसे क़ैदियों की संख्या 2,800 से ज़्यादा बताई थी, जबकि कई लोग अब भी ज़बरन ग़ायब बताए जाते हैं।
रियाद अल-अशकर ने आरोप लगाया कि प्रशासनिक हिरासत इसराइल के हाथ में एक ऐसा हथियार बन चुकी है, जिसके ज़रिए फ़िलिस्तीनियों को बिना किसी क़ानूनी प्रक्रिया के जेलों में उनकी ज़िंदगी से वंचित किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि गुप्त आरोपों की वजह से क़ैदी न तो अपने ऊपर लगे इल्ज़ाम जान पाते हैं और न ही उनका बचाव कर सकते हैं, जिससे निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार पूरी तरह खत्म हो जाता है।
रिपोर्ट के अनुसार, अब तक 11 प्रशासनिक क़ैदियों की मौत इसराइली हिरासत में हो चुकी है। सबसे हालिया मामला बैतलहम के साख़िर ज़ाऊल का है, जिनकी मौत चिकित्सीय लापरवाही के चलते हुई—एक ऐसी मौत जो इस पूरी नीति पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
