पिछले लगभग ढाई वर्षों के दौरान भीषण युद्ध में बुरी तरह तबाह हो चुके क़ाबिज़ फ़लस्तीनी क्षेत्र ग़ाज़ा में, उधार के जूतों और उधार की ख़ुशियों के सहारे आयोजित किए जा रहे फ़ुटबॉल मैच, भीड़भाड़ वाले तम्बुओं, स्कूलों या क्षतिग्रस्त इमारतों में रह रहे हज़ारों लोगों को, ज़िन्दगी की कड़वी सच्चाई से कुछ देर के लिए राहत दे रहे हैं.
इसराइल के क़ब्ज़े वाले ग़ाज़ा पट्टी इलाक़े में इन फ़ुटबॉल मैचों को, एक पूर्व पेशेवर खिलाड़ी असद अल-अज़्ज़ाबी आयोजित कर रहे हैं.
ख़ान यूनिस के पश्चिम में स्थित अल-मवासी इलाक़े में, रेत पर दूर-दूर तक तम्बू तने हैं और पानी व भोजन के लिए लन्बी-लम्बी क़तारें लगी हैं. ऐसे हालात में असद अल-अज़्ज़ाबी एक ऐसे मैच की तैयारी कर रहे हैं जो उनकी पुरानी दुनिया से बिल्कुल अलग है.
असद अल-अज़्ज़ाबी रफ़ाह के अल-तजाम्मू क्लब के लिए फ़ुटबॉल खेलते थे, जहाँ अतीत में उनके और उनके साथियों के पास मैदान, प्रशिक्षण हॉल, कोच और खेल के सभी उपकरण मौजूद थे.
मगर अब तो हालात ये हैं कि अगर उन्हें खेलने के लिए जूते भी मिल जाएँ, तो वे ख़ुद को ख़ुशक़िस्मत समझते हैं. असद कहते हैं, “कभी-कभी मैं किसी दोस्त से जूते उधार ले लेता हूँ या उन्हें टेप लगाकर जोड़ लेता हूँ.”
उनका घर अब अल-रहमा कैम्प का एक तम्बू है. यह रफ़ाह से विस्थापित हुए लोगों का एक आश्रय स्थल है, जहाँ साफ़ पानी और स्वच्छता सेवाओं की भारी कमी है.
वह यहाँ अकेले रहते हैं, क्योंकि उनकी पत्नी अपने कैंसर पीड़ित बेटे के इलाज के लिए जॉर्डन चली गई हैं.
संयुक्त राष्ट्र के आँकड़ों के अनुसार, ग़ाज़ा पट्टी में लगभग 17 लाख लोग क़रीब 1,600 विस्थापन स्थलों पर रह रहे हैं, जिनमें से अधिकांश अस्थाई या अनौपचारिक ठिकाने हैं.

यहाँ के अधिकांश निवासी ट्रकों द्वारा लाए जाने वाले पानी पर निर्भर हैं और उपकरण, ईंधन व मरम्मत सामग्री के प्रवेश पर लगे प्रतिबन्धों से जूझने के लिए मजबूर हैं.
असद अल-अज़्ज़ाबी, बुनियादी ज़रूरतों को पूरा करने के इस युद्ध के बीच, पास के शेख़ अल-ईद कैम्प के साथ होने वाले मैच की तैयारी कर रहे हैं.
वह विस्थापित लोगों के तम्बुओं के बीच बने एक मैदान की ओर पैदल रवाना होने से पहले, रेत पर लकीरें खींचकर अपने खिलाड़ियों को खेल की रणनीति समझाते हैं.
यह मैच केवल एक खेल गतिविधि से कहीं बढ़कर है – यह शिविरों में रहने वाले लोगों के लिए दैनिक जीवन की कठिनाइयों से राहत का एक माध्यम है.
रेतीले मैदान के चारों ओर बच्चे और युवा इकट्ठा होते हैं और खिलाड़ियों का हौसला बढ़ाते हैं. इनमें से कुछ खिलाड़ी तो भोजन, पानी या बैटरी चार्ज करने के लिए घंटों क़तारों में खड़े रहने के बाद यहाँ पहुँचे हैं.
ख़ुशी का एक मात्र सहारा
फ़लस्तीनी फ़ुटबॉल एसोसिएशन के रैफ़री और रफ़ाह के विस्थापित निवासी अला अबू ताहा कहते हैं कि फ़ुटबॉल ग़ाज़ा के बहुत से लोगों के लिए कुछ ख़ुशी का “एकमात्र सहारा” बन गया है.
वे कहते हैं, “हम सीमित से सीमित संसाधनों के साथ भी खेलने की कोशिश करते हैं. अब यहाँ किसी खेल का कोई बुनियादी ढाँचा नहीं बचा है. जिस मैदान पर हम अभी खड़े हैं, वह मूल रूप से बास्केटबॉल और वॉलीबॉल के लिए तैयार किया गया था, लेकिन हमारे लोग शून्य से भी सब कुछ बना लेते हैं.”
युद्ध शुरू होने के बाद से ग़ाज़ा के खेल क्षेत्र को व्यापक नुक़सान पहुँचा है. फ़लस्तीनी फ़ुटबॉल एसोसिएशन के अनुसार, अनेक फ़ुटबॉल खिलाड़ियों सहित सैकड़ों एथलीट मारे जा चुके हैं, जबकि मैदान, क्लब मुख्यालय और प्रशिक्षण हॉल सहित सैकड़ों खेल सुविधाएँ क्षतिग्रस्त या नष्ट हो चुकी हैं.

इसके बावजूद, अल-मवासी में यह नुक़सान, खिलाड़ियों को विस्थापन शिविरों के बीच एक चैम्पियनशिप आयोजित करने से नहीं रोक सका.
विस्थापित दर्शकों की एक छोटी सी भीड़ के सामने मैच शुरू होता है, जिसमें असद अल-अज़ाबी प्लास्टिक टेप से जुड़े जूतों को पहनकर हिस्सा लेते हैं. मैच के अन्त में, अल-रहमा कैम्प ने शेख़ अल-ईद कैम्प को 2-1 से हरा दिया.
आख़िरी सीटी बजने के बाद, कैम्प के युवा खिलाड़ी असद अल-अज़्ज़ाबी और उनके साथियों को अपने कन्धों पर उठा लेते हैं, जबकि बच्चे और नौजवान तम्बुओं के बीच जश्न मनाते हैं.
ज़िन्दगी को संजोने की कोशिश
विस्थापन का दर्द और शोर, मानो कुछ पलों के लिए इस माहौल से ग़ायब हो जाता है, और फ़ुटबॉल ख़ुशी के एक दुर्लभ अवसर के रूप में उभरता है.
असद अल-अज़्ज़ाबी कहते हैं, “इन मुश्किल हालात में, बाहर आकर इस तरह का मैच खेलना बहुत बड़ी बात है. हमारे कैम्प को बधाई. मैं यह चैम्पियनशिप जॉर्डन में अपनी पत्नी और बेटे को समर्पित करता हूँ, और मैं अपने बेटे के जल्द ठीक होने की कामना करता हूँ.”
उनके लिए यह खेल सिर्फ़ एक जीत भर नहीं है. यह उनके दूर जा चुके परिवार के लिए एक सन्देश है, और एक पूर्व खिलाड़ी के रूप में अपनी बाक़ी ज़िन्दगी को संजोने की कोशिश है, गेन्द के पीछे भागना, मानो यही आख़िरी चीज़ बची है जो उन्हें युद्ध से पहले की उनकी पहचान से जोड़ती है.
Source : UN News
