मेवात की बेटी, मज़बूत इरादे और न्याय की कुर्सी तक का सफ़र

हरियाणा के नूंह ज़िले के छोटे से सुनारी गाँव से निकलकर न्यायिक मजिस्ट्रेट बनने वाली रुख़साना की कहानी संघर्ष, धैर्य और अटूट विश्वास की मिसाल है। जिस मेवात क्षेत्र को अक्सर पिछड़ेपन और सीमित संसाधनों के लिए जाना जाता है, वहीं की एक बेटी ने यह साबित कर दिया कि अगर सोच ऊँची हो तो मंज़िल भी ऊँची ही मिलती है।

रुख़साना की शुरुआती पढ़ाई मेवात मॉडल स्कूल, तावडू से हुई। पढ़ाई के प्रति उनका लगाव बचपन से ही साफ़ था। इसी लगन ने उन्हें अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय तक पहुँचाया, जहाँ से उन्होंने एलएलबी की पढ़ाई पूरी की। लेकिन उनका सपना यहीं नहीं रुका। न्यायिक सेवा में जाने की इच्छा ने उन्हें जामिया मिल्लिया इस्लामिया यानि, दिल्ली पहुँचाया, जहाँ उन्होंने एलएलएम कर अपनी तैयारी को और मज़बूत किया।

कक्षा सातवीं में ही रुख़साना ने तय कर लिया था कि उन्हें मजिस्ट्रेट बनना है। यह रास्ता आसान नहीं था। साल 2021–22 में उन्होंने हरियाणा न्यायिक सेवा परीक्षा दी, लेकिन पहले प्रयास में असफल रहीं। इसके बाद उत्तर प्रदेश न्यायिक सेवा परीक्षा में इंटरव्यू तक पहुँचीं, पर चयन नहीं हो सका। लगातार दो झटकों के बावजूद उन्होंने हार मानने के बजाय खुद को और निखारा।

पूरी मेहनत और आत्मविश्वास के साथ उन्होंने पश्चिम बंगाल लोक सेवा आयोग की न्यायिक सेवा परीक्षा दी और पूरे राज्य में तीसरा स्थान हासिल कर दिखा दिया कि सच्ची मेहनत कभी बेकार नहीं जाती। उनकी सफलता सिर्फ़ व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं रही, बल्कि पूरे मेवात के लिए गर्व का कारण बनी।

रुख़साना अपनी कामयाबी का श्रेय अपने परिवार को देती हैं, खासकर अपने पिता मोहम्मद इलियास को, जिन्होंने हर कदम पर उनका साथ दिया। रुख़साना का मानना है कि लड़कियों के लिए शिक्षा सबसे बड़ी ताक़त है। उनकी कहानी हर उस बेटी के लिए संदेश है, जो सपने देखने से डरती है—कि अगर हौसला हो, तो कोई भी मंज़िल दूर नहीं।

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