भारत में फ़ैशन डिज़ाइनिंग अब केवल रचनात्मक अभिव्यक्ति तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह एक संगठित प्रोफेशन और तेज़ी से बढ़ती इंडस्ट्री बन चुकी है। सरकारी नीतियों, घरेलू मांग, ई-कॉमर्स और वैश्विक बाज़ार के विस्तार ने इस सेक्टर में रोज़गार और करियर के नए अवसर पैदा किए हैं।
देश की अर्थव्यवस्था में फ़ैशन इंडस्ट्री की भूमिका
भारत की टेक्सटाइल और अपैरल इंडस्ट्री करीब 4.5 करोड़ लोगों को रोज़गार देती है। कृषि के बाद यह देश की दूसरी सबसे बड़ी रोज़गार देने वाली इंडस्ट्री मानी जाती है। इस क्षेत्र में महिलाओं और ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाले लोगों की भी बड़ी भागीदारी है। आर्थिक योगदान की बात करें तो यह इंडस्ट्री भारत की GDP में 2.3% और कुल निर्यात में 12% का योगदान देती है। भारत दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा टेक्सटाइल मार्केट है। सरकार ने अगले पांच वर्षों में इस सेक्टर को 15 से 20 प्रतिशत की वार्षिक दर से बढ़ाने का लक्ष्य रखा है। विशेषज्ञों के मुताबिक बढ़ती घरेलू खपत, ऑनलाइन रिटेल, वैश्विक मांग और सप्लाई चेन के विस्तार ने फ़ैशन बिज़नेस को नया आकार दिया है।
फ़ैशन डिज़ाइनर की भूमिका क्या होती है?
YWCA में फ़ैशन डिज़ाइनिंग कोर्स पढ़ा चुकीं सुनैना द्वारि दास के अनुसार, फ़ैशन डिज़ाइनर वे प्रोफेशनल होते हैं जो अपनी क्रिएटिव सोच, रिसर्च और कल्पना के ज़रिए कपड़े, एक्सेसरीज़ और फ़ैशन प्रोडक्ट तैयार करते हैं। उनका काम केवल कपड़ों का लुक तय करना नहीं होता, बल्कि
- बदलते फ़ैशन ट्रेंड का अध्ययन
- लोगों की पसंद और बाज़ार की मांग को समझना
- फ़ैब्रिक, रंग और टेक्सचर पर रिसर्च
- डिज़ाइन को स्केच और पैटर्न में ढालना
आज के समय में फ़ैशन डिज़ाइनर का रोल क्रिएटिव के साथ-साथ स्ट्रैटेजिक भी हो गया है। इसमें ट्रेंड एनालिसिस, ब्रांड आइडेंटिटी, कस्टमर बिहेवियर और प्रोडक्शन-मार्केटिंग की समझ शामिल है।
क्या फ़ैशन डिज़ाइनिंग सिर्फ़ सिलाई है?
सुनैना द्वारि दास के मुताबिक यह एक आम धारणा है, लेकिन वास्तविकता इससे कहीं आगे है। फ़ैशन डिज़ाइनिंग में यह समझना भी ज़रूरी होता है कि,
- रेशे से कपड़ा कैसे बनता है,
- कपड़ा बाज़ार तक कैसे पहुंचता है
- फ़ैब्रिक का सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और सामाजिक महत्व क्या है
- इस पेशे में घंटों की स्केचिंग, ट्रायल-एरर और बारीक़ डिटेल पर काम करना शामिल होता है।
कौन बना सकता है फ़ैशन डिज़ाइनिंग में करियर?
फ़ैशन डिज़ाइनिंग हर स्ट्रीम के छात्रों के लिए खुली है। कॉमर्स, आर्ट्स या साइंस तीनों बैकग्राउंड के छात्र इस क्षेत्र में पढ़ाई कर सकते हैं। इसके लिए 12वीं पास होना अनिवार्य है।
- आर्ट्स स्टूडेंट्स स्टोरीटेलिंग और सांस्कृतिक समझ से आगे बढ़ते हैं
- साइंस बैकग्राउंड वाले टेक्नोलॉजी, एनालिटिक्स और सप्लाई चेन में अवसर पाते हैं
- कॉमर्स स्टूडेंट्स ब्रांडिंग, रिटेल और फ़ैशन बिज़नेस में जगह बना सकते हैं
जेडी इंस्टीट्यूट ऑफ़ फ़ैशन टेक्नोलॉजी की प्रवक्ता सृष्टि जायसवाल के अनुसार, इस फ़ील्ड में क्रिएटिविटी, मज़बूत ऑब्ज़रवेशन, धैर्य, ट्रेंड्स के प्रति जागरूकता और लगातार सीखने की इच्छा ज़रूरी है।
करियर विकल्प और सैलरी
फ़ैशन डिज़ाइनिंग की पढ़ाई करने के बाद छात्र-
- फ़ैशन डिज़ाइनर
- फ़ैशन स्टाइलिस्ट
- अपैरल या टेक्सटाइल डिज़ाइनर
- फ़ैशन बायर या मर्चेंडाइज़र
- कॉस्ट्यूम डिज़ाइनर
- फ़ैशन कंटेंट क्रिएटर या कंसल्टेंट, जैसे प्रोफेशन चुन सकते हैं।
सृष्टि जायसवाल के मुताबिक, शुरुआती स्तर पर फ़ैशन डिज़ाइनर को 3 से 6 लाख रुपये सालाना सैलरी मिल सकती है। अनुभव और स्किल बढ़ने के साथ यह आमदनी काफ़ी बढ़ जाती है।
12वीं के बाद छात्र ये कोर्स कर सकते हैं:
- बैचलर ऑफ़ डिज़ाइन (B.Des) इन फ़ैशन डिज़ाइन
- बैचलर ऑफ़ साइंस (B.Sc) इन फ़ैशन डिज़ाइन
- डिप्लोमा इन फ़ैशन डिज़ाइन
इसके अलावा फ़ैशन स्टाइलिंग, पैटर्न मेकिंग और बुटीक मैनेजमेंट जैसे सर्टिफ़िकेट कोर्स भी उपलब्ध हैं। पोस्ट ग्रेजुएशन के लिए M.Des या PG डिप्लोमा किया जा सकता है।
प्रमुख संस्थान
- नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ फ़ैशन टेक्नोलॉजी (NIFT)
- नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ डिज़ाइन (NID)
- सरदार वल्लभभाई पटेल इंटरनेशनल स्कूल ऑफ़ टेक्सटाइल्स एंड मैनेजमेंट (SVPITM)
- इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ फ़ैशन डिज़ाइन (IIAD) और अन्य निजी संस्थान
निष्कर्ष
तेज़ी से बढ़ती टेक्सटाइल और अपैरल इंडस्ट्री के बीच फ़ैशन डिज़ाइनिंग भारत में एक ऐसा करियर बनकर उभरा है, जिसमें क्रिएटिविटी के साथ रोज़गार और आर्थिक स्थिरता दोनों की संभावनाएं मौजूद हैं।
