नफ़रत की आग और सत्ता की सियासत: क्या इतिहास खुद को दोहरा रहा है?

BY : नूर अहमद अज़हरी

जिस स्तर पर आस्था का सहारा लेकर सियासत को गर्म किया जा रहा है वह वाक़ई तश्वीशनाक है..

इतिहास गवाह है कि जब जब हुकूमतों ने मज़हब को सियासी हथियार बनाया तब तब समाज बंटा, नफ़रत बढ़ी और आखिरकार नुकसान पूरे मुल्क ने उठाया…

हमारे देश ने भी 1947 का दर्द देखा है तफ़रीक़ की आग ने किस तरह लाखों घर उजाड़े यह कोई पुरानी कहानी नहीं हमारी क़ौमी याददाश्त का हिस्सा है इसलिए आज अगर वही लहजा वही बाँटने वाली सोच फिर से हवा पा रही है तो फिक्र लाज़िमी है…

नरेंद्र मोदी की क़यादत में चल रही सरकारों से हमारा इख़्तिलाफ़ सियासी है मगर मसला सिर्फ़ सियासत का नहीं मुल्क के मिज़ाज का है….

दिल्ली से लेकर लखनऊ, नागपुर, भोपाल, देहरादून और असम तक अगर कुर्सियों पर बैठे लोग यह समझें कि नफ़रत हमेशा क़ाबू में रहेगी तो यह उनकी सबसे बड़ी भूल होगी उन्हें इतिहास से सबक़ लेना चाहिए…जो भीड़ आज इस्तेमाल की जा रही है वह कल बेक़ाबू भी हो सकती है…
और आज वह भीड़ बे काबू हो चुकी है जिन भाजपा की सरकारों के संरक्षण में भीड़ को भड़काया गया आज उन से ही यह भीड़ संभल नहीं रही है..

अगर यही रवैया रहा तो संविधान सिर्फ़ किताबों में रह जाएगा और उसकी रूह कमज़ोर पड़ जाएगी मुल्क दस्तूर से चलता है दबाव से नहीं… इंसाफ़ से चलता है इश्तिआल से नहीं…

हमारी आवाज़ मुहासबे की है अपना मुहासिबा कीजिए होश में आईए इतिहास से सबक लीजिए वरना अंजाम किसी के हक़ में बेहतर नहीं होगा…

मुसलमानों के खिलाफ भीड़ को उकसाने वाले तबाही के दहाने पर हैं मगर सत्ता पॉवर के लालच में अंधे हो गए हैं…

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