मुद्दों से भटकते चुनाव

(Author : Kashif Qamar)

धर्म, चेहरों और मीडिया के शोर में दबते जा रहे जनता के असली सवाल

लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत चुनाव होते हैं। यही वह प्रक्रिया है जिसके जरिए जनता अपने प्रतिनिधि चुनती है और देश की दिशा तय करती है। चुनाव सिर्फ सरकार बनाने का माध्यम नहीं, बल्कि जनता और सत्ता के बीच जवाबदेही का रिश्ता भी होते हैं। एक आदर्श लोकतंत्र में चुनाव के दौरान रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, महंगाई, महिलाओं की सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और विकास जैसे मुद्दों पर गंभीर बहस होनी चाहिए। लेकिन आधुनिक राजनीति का बदलता स्वरूप यह दिखाता है कि अब चुनावी चर्चा का केंद्र धीरे-धीरे असली मुद्दों से हटकर धर्म, जाति, भावनात्मक नारों और बड़े चेहरों पर सिमटता जा रहा है।

भारत जैसे विशाल और विविधता वाले देश में यह बदलाव सिर्फ राजनीतिक रणनीति नहीं, बल्कि समाज की सोच और मीडिया की भूमिका में आए परिवर्तन का भी संकेत है। पिछले एक दशक में चुनावी प्रचार का तरीका पूरी तरह बदल चुका है। पहले चुनावी सभाएँ, घोषणापत्र और स्थानीय मुद्दे ज्यादा महत्व रखते थे, लेकिन अब सोशल मीडिया कैंपेन, वायरल वीडियो, टीवी डिबेट और आक्रामक प्रचार राजनीति का मुख्य हथियार बन गए हैं।

मुद्दों की जगह भावनाओं की राजनीति

आज के चुनावों में अक्सर देखा जाता है कि बेरोजगारी, शिक्षा या स्वास्थ्य जैसे कठिन सवालों की तुलना में धार्मिक और भावनात्मक मुद्दों को ज्यादा हवा दी जाती है। राजनीतिक दल जानते हैं कि भावनाएँ लोगों को जल्दी प्रभावित करती हैं। यही कारण है कि चुनावी भाषणों में मंदिर, मस्जिद, राष्ट्रवाद, जातीय पहचान और ऐतिहासिक विवादों का जिक्र बार-बार दिखाई देता है।

भारत में चुनावी राजनीति में धर्म का इस्तेमाल नया नहीं है, लेकिन डिजिटल युग ने इसकी पहुंच और प्रभाव दोनों को कई गुना बढ़ा दिया है। अब एक भाषण, एक वीडियो क्लिप या एक बयान कुछ ही मिनटों में करोड़ों लोगों तक पहुँच जाता है। सोशल मीडिया एल्गोरिद्म भी वही कंटेंट ज्यादा फैलाते हैं जो लोगों की भावनाओं को भड़काए या उन्हें ज्यादा देर तक स्क्रीन पर रोके रखे। ऐसे में गंभीर नीतिगत चर्चाएँ अक्सर पीछे छूट जाती हैं।

युवा वोटर और सोशल मीडिया का प्रभाव

भारत दुनिया की सबसे युवा आबादी वाले देशों में से एक है। चुनाव आयोग के आँकड़ों के अनुसार करोड़ों युवा पहली बार वोट डालते हैं। यह वर्ग सोशल मीडिया से सबसे ज्यादा जुड़ा हुआ है। राजनीतिक दल अब युवाओं तक पहुँचने के लिए इंस्टाग्राम रील्स, यूट्यूब शॉर्ट्स, फेसबुक पोस्ट और व्हाट्सऐप फॉरवर्ड का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करते हैं।

समस्या तब पैदा होती है जब जानकारी और प्रचार के बीच की सीमा धुंधली होने लगती है। कई बार आधी-अधूरी जानकारी, एडिट किए गए वीडियो या भ्रामक दावे इतनी तेजी से फैलते हैं कि लोग बिना तथ्य जांचे ही राय बना लेते हैं। चुनावों के दौरान फेक न्यूज़ और दुष्प्रचार एक बड़ी चुनौती बन चुके हैं।

ऑक्सफोर्ड इंटरनेट इंस्टीट्यूट की कई रिपोर्टों में यह बात सामने आ चुकी है कि दुनिया के कई देशों में राजनीतिक दल और संगठित समूह सोशल मीडिया का इस्तेमाल जनमत को प्रभावित करने के लिए करते हैं। भारत भी इससे अछूता नहीं है। चुनावी माहौल में ट्रेंड चलाना, विरोधियों के खिलाफ ऑनलाइन अभियान और भावनात्मक कंटेंट फैलाना आम रणनीति बन चुका है।

मीडिया: चौथा स्तंभ या चुनावी मंच?

लोकतंत्र में मीडिया को चौथा स्तंभ कहा जाता है क्योंकि उसका काम सत्ता से सवाल पूछना और जनता तक निष्पक्ष जानकारी पहुँचाना होता है। लेकिन आधुनिक टीवी मीडिया का एक बड़ा हिस्सा अब टीआरपी और राजनीतिक ध्रुवीकरण के दबाव में काम करता दिखाई देता है।

टीवी डिबेट में अक्सर वही मुद्दे चुने जाते हैं जिनसे विवाद पैदा हो, शोर बढ़े और दर्शक जुड़े रहें। कई बार घंटों तक धार्मिक या राजनीतिक बयानबाज़ी पर बहस होती है, लेकिन बेरोजगारी, सरकारी स्कूलों की हालत, स्वास्थ्य सेवाओं या किसानों की समस्याओं पर उतनी गहराई से चर्चा नहीं दिखाई देती।

मीडिया रिसर्च से जुड़े कई अध्ययनों में यह बात सामने आई है कि चुनावी कवरेज का बड़ा हिस्सा नेताओं की रैलियों, बयानबाज़ी और राजनीतिक रणनीतियों पर केंद्रित रहता है, जबकि जमीनी मुद्दों को सीमित जगह मिलती है। इससे आम जनता का ध्यान भी धीरे-धीरे असली समस्याओं से हटने लगता है।

चेहरे बनाम नीतियाँ

आधुनिक राजनीति में “व्यक्तित्व आधारित चुनाव” तेजी से बढ़े हैं। अब राजनीतिक दल अपने पूरे अभियान को एक बड़े चेहरे के इर्द-गिर्द तैयार करते हैं। पोस्टर, विज्ञापन, टीवी प्रचार और सोशल मीडिया पोस्ट में स्थानीय उम्मीदवारों से ज्यादा राष्ट्रीय नेताओं की छवि दिखाई देती है।

यह राजनीति लोगों को भावनात्मक रूप से जोड़ती है, लेकिन कई बार इससे स्थानीय मुद्दे दब जाते हैं। गाँव की सड़क, शहर की जल समस्या, अस्पतालों की हालत या रोजगार के अवसर जैसे विषय चुनावी चर्चा में पीछे चले जाते हैं। जनता भी कई बार नीतियों की बजाय व्यक्तित्व और लोकप्रियता के आधार पर मतदान करने लगती है।

लोकतंत्र पर असर

जब चुनाव मुद्दों से हटकर भावनात्मक ध्रुवीकरण पर केंद्रित हो जाते हैं, तब लोकतंत्र की गुणवत्ता प्रभावित होती है। जनता सरकारों से कठिन सवाल पूछना कम कर देती है। जवाबदेही कमजोर पड़ती है और राजनीतिक दल भी जानते हैं कि भावनात्मक मुद्दे असली सवालों से ध्यान हटाने में मदद कर सकते हैं।

इसका असर समाज पर भी पड़ता है। चुनावी माहौल में धार्मिक और सामाजिक तनाव बढ़ने लगते हैं। सोशल मीडिया पर नफरत भरी भाषा और झूठी खबरें लोगों के बीच अविश्वास पैदा करती हैं। कई बार चुनाव खत्म होने के बाद भी समाज में उसका असर लंबे समय तक बना रहता है।

क्या समाधान संभव है?

इस स्थिति का समाधान सिर्फ राजनीतिक दलों से नहीं, बल्कि जनता और मीडिया दोनों से जुड़ा है। सबसे पहले मतदाताओं को यह समझना होगा कि चुनाव सिर्फ भावनाओं का नहीं, भविष्य का फैसला होता है। जब जनता रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास जैसे सवालों को प्राथमिकता देगी, तभी राजनीति भी मजबूर होकर उन मुद्दों पर बात करेगी।

मीडिया संस्थानों की जिम्मेदारी भी बेहद महत्वपूर्ण है। उन्हें सिर्फ सनसनी और बहस की बजाय जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्य आधारित पत्रकारिता और जनता के असली मुद्दों पर ध्यान देना होगा। स्वतंत्र पत्रकारिता और फैक्ट चेकिंग आज पहले से कहीं ज्यादा जरूरी हो चुकी है।

शिक्षा भी इसमें अहम भूमिका निभाती है। जागरूक और तथ्य आधारित सोच रखने वाला समाज आसानी से दुष्प्रचार का शिकार नहीं होता। युवाओं को सोशल मीडिया पर दिखने वाली हर जानकारी को अंतिम सत्य मानने के बजाय उसकी जांच करने की आदत विकसित करनी होगी।

(The author is Journalism Student of Jamia Millia Islamia)

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *