‘स्मार्ट’ फोन बना बच्चों की कमजोरी! PISA 2025 की चौंकाने वाली रिपोर्ट, कोविड के बाद छात्रों का प्रदर्शन सबसे निचले स्तर पर

नई दिल्ली: हाल ही में आई OECD (आर्थिक सहयोग और विकास संगठन) की PISA 2025 की ताजा रिपोर्ट ने अनुसार दुनियाभर के अभिभावकों और शिक्षाविदों की चिंता बढ़ गयी है। रिपोर्ट के मुताबिक, दुनियाभर के 23 देशों में 15 वर्ष की आयु के छात्रों का शैक्षणिक प्रदर्शन पिछले एक दशक में सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है। छात्रों का यह गिरावट भरा ग्राफ मुख्य रूप से गणित, विज्ञान और रीडिंग जैसे तीनों प्रमुख क्षेत्रों में देखा गया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस गिरावट के पीछे कोविड-19 महामारी के बाद बदले हालात और बच्चों का बढ़ता ‘स्क्रीन टाइम’ सबसे बड़ा कारण है। महामारी के दौर में मजबूरी में शुरू हुई ऑनलाइन पढ़ाई और डिजिटल उपकरणों की लत अब बच्चों के मानसिक विकास, ध्यान केंद्रित करने की क्षमता और पढ़ाई के स्तर को बुरी तरह प्रभावित कर रही है।

बच्चो पर मोबाइल और स्क्रीन टाइम का सीधा

रिपोर्ट का सबसे चौंकाने वाला पहलू बच्चों द्वारा गैजेट्स के अत्यधिक इस्तेमाल से जुड़ा हुआ है। आंकड़े इस बात की तस्दीक करते हैं कि जरूरत से ज्यादा फोन या लैपटॉप का इस्तेमाल बच्चों की बौद्धिक क्षमता को कमजोर कर रहा है जो छात्र दिन में केवल 1 घंटा मोबाइल या लैपटॉप का उपयोग करते हैं, उनका विज्ञान विषय में औसत स्कोर सबसे बेहतर यानी 507 अंक रहता है।

बढ़ता समय, घटते अंक: जैसे-जैसे बच्चों का स्क्रीन टाइम बढ़ता है, उनके परीक्षा अंकों में भारी गिरावट दर्ज की जाती है। जो छात्र 2 घंटे से ज्यादा स्क्रीन पर समय बिताते हैं, उनका औसत स्कोर घटकर 482 पर आ जाता है। जो बच्चे रोजाना 5 से 7 घंटे तक स्क्रीन या मोबाइल से चिपके रहते हैं, उनका प्रदर्शन सबसे खराब रहता है और उनका औसत स्कोर गिरकर मात्र 434 अंक तक ही सीमित रह जाता है। दिलचस्प बात यह है कि जिन बच्चों ने पढ़ाई या अन्य कारणों से बिल्कुल भी डिजिटल डिवाइस का इस्तेमाल नहीं किया, उनका स्कोर 499 दर्ज किया गया, जो औसत से काफी बेहतर है।

कितना नीचे गिरा ग्राफ?

यदि हम आंकड़ों पर नजर डालें तो तस्वीर एकदम साफ है, 2006 में जहां मैथ्स में औसत स्कोर 501 था, वो 2025 में गिरकर 469 पर आ गया. ऐसा ही हाल रीडिंग का भी है, 495 से गिरकर 466 रह गया है. साइंस में भी 503 से 486 पर आ गया है. 2000 के आखिर तक और 2010 की शुरुआत में स्कोर लगभग स्थिर था, लेकिन पिछले कुछ सालों में लगातार गिरावट आ रही है.

आगे की राह और समाधान

इन आंकड़ों से यह साफ हो जाता है कि सीमित और अनुशासित रूप से तकनीकी उपकरणों का इस्तेमाल शिक्षा के लिए ठीक है, लेकिन आवश्यकता से अधिक स्क्रीन टाइम बच्चों की बुद्धि, याददाश्त और परीक्षा परिणामों को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचा रहा है। शिक्षाविदों और बाल मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि बच्चों को इस डिजिटल लत से बाहर निकालने के लिए अब स्कूलों और घरों, दोनों ही स्तरों पर ठोस और कड़े कदम उठाने की सख्त जरूरत है। बच्चों के दैनिक जीवन में शारीरिक गतिविधियों और ऑफलाइन किताबों की आदत को दोबारा बढ़ावा देना होगा।

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