जन्नतुल बक़ी और मिटाने की सियासत: आज इस्लामी विरासत क्यों ज़रूरी है

(डॉ. शुजात अली क़ादरी)

मदीना के दिल में जन्नतुल बक़ी मौजूद है—एक ऐसी जगह जो इस्लाम की शुरुआती यादों को अपने अंदर समेटे हुए है। यहीं पर पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ के परिवार, उनके सहाबा और इस्लाम की कई अहम शख्सियतें दफ़न हैं। लेकिन आज जो वहाँ दिखाई देता है, वह एक संरक्षित विरासत नहीं, बल्कि एक सपाट और सादा कब्रिस्तान है—जिसकी पहचान लगभग मिट चुकी है। यह एक गहरी ऐतिहासिक टूटन को दिखाता है।

बीसवीं सदी की शुरुआत में सऊदी हुकूमत ने, वहाबी विचारधारा के प्रभाव में आकर, जन्नतुल बक़ी को गिरा दिया। यह घटना मुस्लिम दुनिया के आधुनिक इतिहास की सबसे विवादित घटनाओं में से एक है। यह हमें सत्ता, मज़हबी सोच और इतिहास को मिटाने की सियासत पर सोचने के लिए मजबूर करती है।

सदियों तक जन्नतुल बक़ी सिर्फ एक कब्रिस्तान नहीं था, बल्कि इतिहास की कई परतों से भरी एक जगह थी। वहाँ छोटे-छोटे गुम्बद और निशान मौजूद थे, जो इस्लामी इतिहास की अहम हस्तियों की कब्रों को पहचान देते थे—जैसे अहले बैत और सहाबा। मदीना आने वाले ज़ायरीन वहाँ जाकर फ़ातिहा पढ़ते और इस्लाम की शुरुआती पीढ़ियों से रूहानी जुड़ाव महसूस करते थे।

यह सब 1925 में अचानक बदल गया, जब सऊदी ताकतों ने हिजाज़ पर कब्ज़ा मजबूत किया। वहाबी/सलफ़ी सोच के अनुसार कब्रों पर बने ढांचे जायज़ नहीं माने गए, इसलिए सभी गुम्बद और निशान गिरा दिए गए। इसके बाद उस जगह की पूरी सूरत बदल गई—उसकी ऐतिहासिक और वास्तु पहचान खत्म होकर एक जैसी सादगी में बदल गई।

इस कदम के पीछे जो दलील दी गई, वह वहाबी उसूलों पर आधारित थी, जो कुछ प्रथाओं को “बिदअत” मानकर खत्म करना चाहती थी। लेकिन दुनिया भर के कई मुसलमानों के लिए यह सिर्फ सुधार नहीं, बल्कि उनकी सामूहिक यादों को मिटाने जैसा था।

सऊदी नजरिए में इसे “मज़हबी सुधार” बताया जाता है, लेकिन व्यापक दृष्टि से देखें तो यह सांस्कृतिक विरासत के नष्ट होने जैसा लगता है।

दुनिया भर में समाज अपने ऐतिहासिक स्थलों को इसलिए बचाते हैं क्योंकि वे उनकी यादों और पहचान का हिस्सा होते हैं—चाहे भारत के मंदिर हों, यूरोप के गिरजाघर या पूर्वी एशिया के बौद्ध मठ। इस नज़र से देखें तो जन्नतुल बक़ी को समतल करना एक तरह से इस्लामी विरासत को एक ही सोच के हिसाब से बदलने जैसा लगता है।

अक्सर इस मुद्दे को सिर्फ शिया-सुन्नी विवाद के रूप में देखा जाता है, लेकिन यह पूरी सच्चाई नहीं है। इतिहास बताता है कि इस कदम की आलोचना मुस्लिम समाज के अलग-अलग हिस्सों से हुई थी। जन्नतुल बक़ी में दफ़न शख्सियतें किसी एक फिरके की नहीं, बल्कि पूरी उम्मत की साझा विरासत हैं। इसलिए उनका मिटना एक सामूहिक नुकसान है।

आज भी दुनिया भर में इस घटना को याद किया जाता है, जो बताता है कि जन्नतुल बक़ी की अहमियत अभी भी लोगों के दिलों में ज़िंदा है।

आज के दौर में, जब दुनिया भर में सांस्कृतिक विरासत खतरे में है—चाहे युद्ध के कारण या तेज़ी से हो रहे विकास के कारण—जन्नतुल बक़ी का मुद्दा और भी अहम हो जाता है। एक तरफ मुस्लिम समाज अपनी पहचान और इतिहास पर गर्व की बात करता है, वहीं दूसरी तरफ उसकी कुछ सबसे अहम ऐतिहासिक जगहें मिट चुकी हैं या बदली जा चुकी हैं।

यह एक बड़ा सवाल खड़ा करता है: क्या कोई सभ्यता अपने इतिहास से कटकर आगे बढ़ सकती है?

दुनिया भर में समय-समय पर जन्नतुल बक़ी की बहाली की मांग उठती रही है। हालांकि राजनीतिक हालात इसे मुश्किल बनाते हैं, लेकिन मूल बात साफ़ है—साझा विरासत को बचाना ज़रूरी है।

आज ज़रूरत टकराव की नहीं, बल्कि बातचीत की है। मुस्लिम दुनिया में एक खुला और व्यापक संवाद—जो फिरकों और क्षेत्रों से ऊपर उठकर हो—इस मुद्दे को विवाद से निकालकर ज़िम्मेदारी में बदल सकता है। अगर जन्नतुल बक़ी को किसी भी रूप में संरक्षित किया जाता है, तो यह सिर्फ इमारतों की बहाली नहीं होगी, बल्कि इस्लामी इतिहास की विविधता को स्वीकार करने का संकेत होगा।

आज जन्नतुल बक़ी इस बात की याद दिलाता है कि सत्ता और विचारधारा सिर्फ वर्तमान ही नहीं, बल्कि इतिहास को भी बदल सकते हैं। इसका खालीपन सिर्फ इमारतों की कमी नहीं, बल्कि एक सहमति के अभाव को भी दिखाता है।

पूरी दुनिया के मुसलमानों के लिए जन्नतुल बक़ी एक बड़ा सबक है—कि इतिहास को बचाना पीछे देखने की बात नहीं, बल्कि एक बेहतर, जागरूक और एकजुट भविष्य बनाने की बुनियाद है।

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